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जब मैं इंसान बन जाऊँगा

जब मैं इंसान बन जाऊँगा
क्या तब भी दुनिया तटस्थ रह पाएगी?
क्या तब भी सर के ऊपर मंडराता हुआ कौवा
ख़बर देगा किसी अपने के आने की?
क्या तब भी खपरैल के ऊपर चढ़ती
कोहड़े की बेल मुस्कायेगी मुझे देख कर?
और क्या माँ तब भी मेरी जिद्द पूरी करेगी
उसपर खिले फूल को तोड़ बचका बनाने की?
और क्या तब भी मैं इसी स्वाद से खा पाऊँगा?

जब मैं इंसान बन जाऊँगा
क्या तब भी बाबूजी के कुदाल की मिट्टी
मेरे पैरों को गंदा कर सकेगी?
और मैं अपने सर पर प्लास्टिक की पाइप लिए
खेतों में जा सकूंगा?
और नहा सकूंगा ट्यूबवेल में?
क्या तब भी हैंडपंप में पानी आएगा?
मुसहरों के खेलते लड़के क्या तब भी इंतज़ार करेंगे
पानी पीने के पहले, मेरे वहां से हटने का?

जब मैं इंसान बन जाऊँगा
तो क्या तब भी मेरी बहन स्कूल जाने से बचने के लिए
माँ के काम में हाथ बटायेगी?
क्या तब भी वो छत पे जाके चुपके से
बाबूजी का रेडियो लिए, गानों के बीच खर्र खर्र सुनेगी?
और क्या तब भी मैं उसकी चुटिया खींच पाऊँगा?
और वो दादी का चिल्लाना नजरअंदाज कर
क्या तब भी मेरी साइकिल के पीछे दौड़ पायेगी
ताकि मैं तितली का घर बनाने में उसकी मदद कर सकूं?

14 Comments

splendid……….

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great poem and great thoughts

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Vibrant with emotions- क्या खूब ज्ञन्कार है

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विकास जी, अक्सर आप वो बातें लिख देते हैं, जिन्हें या तो हम भूल चुके हैं, या फिर याद नही करना चाहते…….जो भी हो इतनी सुंदर कविता के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।
पूरे पाँच स्टार आपकी इस रचना के लिए………….
आप ने यहाँ दी जाने वाली अन्य पोस्ट के मध्य अपना स्तर सुरक्षित रखा है उसके लिए भी बधाई स्वीकारें।

शुभकामनाएं……….

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Vikash Reply:

बहुत बहुत धन्यवाद गौरव जी.

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Fantabulous! bahut sunder shabdon mein puraani yaaden taaza ho gayin.

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A good poem with intense
feelings.congrats.

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fantastic really great poem with emotions

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विकाश,सही अर्थों में यह एक कविता है और इसीलिए p4p का रस बना हुआ है.
डॉ,पूर्णिमा,गौरव और तुम….p4p पर बहुत ही अच्छा लिख रहे हो,पढ़कर मज़ा आ रहा है और इसीलिए मैंने अपनी कवितायें पोस्ट करना कम कर दी हैं,तुम तीनों ही कुछ अलग-सा लिख रहे हो और वह आनंद भी दे रहा है.

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Vikash Reply:

aap apni kavitayen post karna kam mat kijiye. :) aapki kavitaayen padhne me hume bhi to aanand aata hai.

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बहुत खुब विकाश,दिल को छू लेनेवाली कविता हॅ.

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khuli kavita samjhane hamesha hi ykleef hui hai phir bhi achhi lagi .
shabad jahan achhe lagen tareef karo
dil ko chhuen tareef karo
pass aayen tareef karo
door jayen tareef karo
shabd tareef k qabil hote hai
Raj Kumar Rajdev

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वाकई गाँव और बचपन दोनों याद आ गए

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bahut hi achhi kavita.
heart touching

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