‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं एक ब्याही हूई बेटी हूँ ।
अक्सर माँ के घर जाती हूँ ।
और इसके लिए अपने पति से स्वीकृति लेती हूँ कि
क्या थोङे दिन अपने घर जा आँऊ ।
पति मुस्कुराते हुए गर्दन हिलातें हैं पर साथ ही
एक प्रश्नचिन्ह लगातें हैं । अपने घर जा रही हो ,
तो फिर ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं अभी कोई बहस नही चाहती क्योंकि जाना चाहती हूँ ।
माँ के घर पहुँचती हूँ ।
अजीब कशिश है इन दिवारों में , इन दरवाजों में
लगता है खुद-ब-खुद खुलतें हैं मेरे लिए ,
बिना मेरे हाथ लगे ।
भाई के बच्चों की बुआ बनी उन्हे बताती हूँ
कि इन अलमारियों में छुपते थे कभी
इस छत से कूद कर पङोसियों के घर जाते
और यहाँ से निकल कर डरा देते
पीछे से भईया कभी ।
बच्चे बङी-बङी आँखें करते पुछते , पहले आप यहीं रहते थे
फिर अब क्यों नही रहते हर रोज़
पहले ये आपका घर था । अब ‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जल्दी में हूँ , माँ से बात करना चाहती हूँ ।
माँ कुछ चिंतित सी हैं । पता नहीं पापा से कुछ बात हुई
या भाभी ने कुछ कहा । लो शुरू हो गई ……
बेटी मैंनें इस घर के लिए क्या कुछ नही किया
किन मुश्किलों से अपने हाथ से एक एक चीज़ बनाई ।
इसको सजाया सवाँरा , याद है टायलों का डिज़ाईन
चुनने के लिए कितनी दुकानों के चक्कर लगाए थे ।
और अब अपनी मर्ज़ी से इस घर में रह नही सकते ।
सब कमरों पर बहुओं का , बच्चों का कब्जा है ।
और अब ये इसे बेचना चाहते हैं । मैंनें बनाया है इसे ,
मैं इसे बिकने नहीं दूंगीं । ये जानते नही कि
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि आसुँओं से बचना चाहती हूँ ।
भईया-भाभी के कमरे में दरवाजा खङका कर जाती हूँ ।
दीदी आप ही बताओ
हमें इस घर में नहीं रहना
पुराने डिज़ाईन का है । बच्चों के लिए सोसाइटी भी अच्छी नही है ।
पॉश एरिया में एक घर देख रखा है ।
पूरे पैसे एक ही बार में मांग रहे हैं ।
थोङे ही कम रहते हैं ।
अगर मम्मी पापा इसे बेच कर कुछ मदद कर दें तो ……
जीते जी कुछ दे जाए तो ………
इनके बाद तो वैसे भी …. और.
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि जानती हूँ कि यहाँ बस मैं मेहमान हूँ ।
गेट के पास लॉन में पापा बैठे हैं ।
कब आई बेटा , रूकेगी क्या ,
अपनी मम्मी को समझा कर जाना
ये मोहताज़ी की उम्र है , इसमें इतनी ठसक ठीक नहीं ।
फिर अपने दिन क्यों भूलती है ।
जब गाँव की जमीन बिकवा कर यहाँ मुझे
शहर में ले आई थी ।
ये तो दुनियाँ की रीत है बेटा ,
इसे हँस कर निभाना चाहिए ,
अब इस उम्र में इस झगङे में क्या पङना कि वो घर किसका था और ….
‘‘ये घर किसका है ।’’
मैं कोई बहस नही चाहती क्योंकि इस बहस से निकलना चाहती हूँ ।
इसका एक ही तरीका है कि चलुँ वापस , अपने घर
पति और बच्चे भी राह देखते होगें ।
गेट से बाहर निकलते ही लगा कि कोई बुला रहा है ।
कौन…. मुङ कर देखा , संगमरमर के पत्थर पर ,
भाई और पापा के नाम की तराशी नेमप्लेट लगी थी ,
पर बुलाया किसने ……………
जा रही हो पर मुझसे तो पुछो …..
क्या !
ये तो घर की दिवारें बोल रही है ।
हाँ ?
याद है जब नींव डाली गई
पहली ईंट रखी गई
उस पर गारा चिपका ईंट दर ईंट
मज़दूरों ने मुझे गढ़ा
मुझे लगा कि ये मज़दूर ही मेरे मालिक हैं
और चूंकि निर्माता हैं मेरे , तो शायद मैं इन्ही का हूँ ।
पर जैसे-जैसे मैं आसमान की ओर बढ़ता रहा ,
इनका कोई अता पता न रहा ।
फिर जब मुहुर्त हुआ सब देखने आए
मैं भी गर्व से तना प्रस्तुत रहा सबके लिए
सब पापा को बधाई दे रहे थे ।
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
तुम बच्चे मेरी दिवारों पर पेन्सिलों से
अपनी पाठशाला के शब्द लिखते
माँ जी मुझे साल दर साल पुतवाती-पुँझवाती
मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
फिर मैं फूलों से सजाया गया
दुघिया रोशनियों में नहाया गया
तुम सबकी शादियाँ हुई
नई बहुएँ आई , उन्होनें मुझे अपनाया
अपने नए ढंग से सजाया
मेरा नाम बदल कर ससुराल हो गया
फिर मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ ।
पर अब जो मेरी दिवारों के कान
नई बातें सुन रहे हैं
मेरा तो कलेजा ही काँप जाता है
मुझे बेचने की बात हो रही हैं
देखो बेटा ,
तुम्हारे माँ बाप की जवानी की हसरतें ,
तुम्हारी बचपन की शरारतें ,
तुम सब की शादियाँ , फिर तुम्हारे बच्चे ,
इन सब हकीकतों का पत्थराया सबूत हूँ मैं ,
कोई आता है , इससे पहले कि वो बेल बजाता है ,
मेरे सीने पर गढ़ा ये संगमरमरी पत्थर
उसे मेरी पहचान बताता है ।
पर अब समय के साथ ,
तुम्हारे माँ बाप और
उनकी हसरतों के साथ ,
मैं भी बूढ़ा हो चला हूँ ।
अब इस उम्र में मेरे साथ ये मज़ाक न करो ।
न जाने किसके हाथ बेचा जाएगा ,
वो इसे फिर अपने नए ढंग से सजाएगा ,
मेरे सीने पर हथौङा चला ये पत्थर उखाङकर ,
अपने नाम का पत्थर लगवाएगा ।
बेटा,
आज तक तुम्हारे बाप के नाम से ही
अपनी पहचान बताता आया हूँ
इस बूढ़ापे में जबकि मुझे एल्ज़ाइमर हो चला है ,
कोई पुछेगा तो कैसे बताऊँगा , कि
‘‘ये घर किसका है ।’’
29 Comments
बहुत अच्छी कविता है । पढ़े-लिखे तो सभी है पर ऐसा लिखना ऐसा सोचना सब के बस का नहीं है । बेटी पूनम को बहुत धन्यवाद । भगवान तुम्हे हमेशा खुश रखे ।
तुम्हारी मम्मी जी ,
सावित्री ।
jisko likhte hue,
kehte hue ya sunte hue,
aankhon mein aansoon aa jayein,
veh satya hai,
dil ki gehraaiyon se nikla hua,
pyaar ke stotrt mein bheega hua.
Ati sundar rachna.
I have no words to express how much I liked the poem…
Though I was in a hurry I did managed to finish it. Very intense and beautifully written. Very deep and meaningful too. Touch my heart and I feel we all can relate to it this or the other way…
Without any doubt,’poem of the day’…
Still it would be a lesser felicitation…
Keep writing…
taareef ko shbdon main bandhna shayed rachna kee rusvai hogee-atoot rishton ke bikhrte dhaagon ka chiter anmol hai-khamosh pathron ke drd ko jubaan de kr manv man ko uske anter tk aapkee klm ne jinjhor diya hai-attee sunder
इतनी बड़ी कविता थी कि मुझे डर था कि मैं पूरा नहीं पढ़ पाऊँगा. लेकिन जैसे ही पढ़ना चालू हुआ, पता ही नहीं चला कि कविता कब आई और गई. कितनी वेदना और सच्चाई झलकती है कविता में. पढ़कर मन गदगद हो गया. बहुत दिनों बाद कोई इतनी सशक्त कविता पढ़ी है. धन्यवाद.
अभी परसों ही मैं एक सज्जन से यह बहस कर रहा था कि आख़िर स्त्री का घर कौन-सा होता है.बचपन से वह माँ-बाप के घर पराये अमानत की तरह पलती है और विवाह के बाद उसके “पति का घर” होता है, उसकी “ससुराल” होती है,जहाँ उसकी हर करनी पर “मायके” को ढूंढा जाता है…….और आज यह कविता पड़ने मिली,जीवन का कठोर सच है कि आख़िर स्त्री का “घर” कौन-सा है.किस दिन वह कहेगी कि यह “घर” मेरा है-यह दुनिया मेरी है.
मेरी दृष्टि में यह इस माह की सर्वश्रष्ठ रचना है.
कोई स्टार नहीं दूगां क्योंकि कुछ रचनाये इन सबसे परे होती हैं.
Really its heart-touching & with full of emotions of a lady.
This is very nice poem which has written by depth of a heart.
काफी अच्छी कविता आपके अपने अनुभव पर लगती है
उस बाबूल से पूछिए बेटी का बिछोह क्या होता है
“बहने चिडीया दूर गगन से आएं
हर आंगन में मेहमान सी, पकड़ो तो उड़ जाएं”
बहुत बहुत धन्यवाद अछी कविता के लिए
AAP KI KAVITA ACHI HAI,PER YE KAVITA NA HOHER EK MINI NAWWEL
LAG RAHI HAI.ASI KAWAITA LIKHNE KE LIYE SAMYE CAHIYE JO AAP KE PASS BAHOOT HAI.KEEP IT UP.
क्या बात है | बहुत ही सुंदर, अति उत्तम ह्रदयस्पर्शी कविता | जीवन प्रवाह की सच्चाई का बहुत भावपूर्ण साक्षात्कार | जितनी तारीफ़ करें कम ही लगती है | इस रचना के लिए हार्दिक बधाई |
dil se nikla hua har shabad har ladki ki kahani kahata hai tere mere bachpan jaisa sapno ka ghar hi lagta hai tune to kahe di panno par. par mere dil ke taro ka dard bhra sur lagta hai
i m speechless… aapne har paksh itni acchi tarah se rakhaa hai ki kya kahoon… itni lambi kavitaon ko sambhale rakhna praaya mushkil hota hai parantu aapne ye bakhoobi kiyaa hai…
wid regards
Panchwi bar hamne aapki esh rachna ko parha hai.
ish layak to nahi hai ki kuchha kahe, per itna jarur kahege ki ish rchna ka koe Jabab nahi.
hi
while reading this poem i went into my past, my childhood and in the last i was left with tears in my eyes.
hats off to you.
regards
vishal
फिर मैं फूलों से सजाया गया
दुघिया रोशनियों में नहाया गया
तुम सबकी शादियाँ हुई
नई बहुएँ आई , उन्होनें मुझे अपनाया
अपने नए ढंग से सजाया
मेरा नाम बदल कर ससुराल हो गया
फिर मुझे लगा
मैं इन्ही का हूँ
Itna gehre vichaar aur Shabd chitran..shaayd ghar bol sakta To Kuch aisa Hi kehtaaa
extremely beautifull…muje samaj nahi aa rha kya likhon….par apki kavita padnae ke baad..agar likhoonga nahi to mera poora din khali khali rahega…ur poem touch my heart… meri mummy aur sister baar baar mere khayal main aa rahe the …..beautifullllllllll….and very touchy poetry…
thanks
मुझे रुला गयी ये इमोशंस से भरी रचना. ऐसी उत्कृष्ट रचना कभी-कभी ही पढने को मिलती हैं. ऐसी रचनाएं किसी तारीफ़ की मोहताज नहीं होतीं

Master of vety. science & working as surgeon. Am a famous radio jokey of AIR Hisar FM. Fond of writing poems and stories, making paintings. Mom of a naughty and dashing son 'SHINOY'.
http://sookoon-e-rooh.blogspot.com/
bahut- bahut sunder kavita hai….aur touchy bhi…
Comment on this comment