मैं
निःशब्द का मैं शब्द हूँ, स्तम्भ निराधार का
सार्वभौम सत्य हूँ मैं, शून्य के आकार का.
अगम हूँ मैं- अज्ञात हूँ, छुपती छुपाती बात हूँ.
प्रेम का प्रतिबिम्ब हूँ, आंसू किसी उपहार का.
सार्वभौम सत्य हूँ मैं, शून्य के आकार का.
मैं अनाहत नाद हूँ, मैं मौन का संवाद हूँ
मैंने जो नियम बनाये, उनका मैं अपवाद हूँ.
जन्म का उपसर्ग, प्रत्यय मृत्यु के अवतार का
सार्वभौम सत्य हूँ मैं, शून्य के आकार का
Note: Its a repost. I added few lines.

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मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
अति सुंदर, अति गहन,
विवेचन है, इस कविता का.
बहुत खूब और अति उत्तम
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