मैं जिन्दगी का आइना हूँ………..


इतने दिनों की अनुपस्थिति के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ………बीते माह संवेदना कुछ क्षीण सी हो चली थी…..जीवन की भौतिकता में कुछ ज्यादा ही उलझ गया था………….एक नन्ही बच्ची ने जैसे फिर से मुझे जगा दिया, ये कविता उसी के नाम………
जिन्दगी की चमक देखी,
खुश्बू देखी, खूबसूरती भी……….

मासूमियत की महक देखी,
नन्हीं सी सितारा आँखें,
साँसों में मोहब्बत की नमी……….
तोतली, पर बेपनाह प्यारी बातें………..

ऊँगली पकड़, डगमगाती…….
चलने की कोशिश करती……
इठलाती, खिलखिलाती………
और मुझमें उमंगों का समंदर भरती…….

मैं जिन्दगी का आइना हूँ, बिखरने न देना……..
कहती रही…………..
एक नन्ही बच्ची, मेरी गोद में खेलती रही………

मैंने  ऊँगली से नाक  छू ली, तो हंस दी………..
यूँ तो शाम हो चली है पर,
मैं अब भी खोया हूँ, उलझा हूँ, 

उसकी मासूमियत में,
अपनी जिन्दगी की तमाम सख्तियाँ भूल कर………………

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Comments

very nice poem…….!

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बहुत सुंदर सी कविता,
वाचक को अपनाती
और मासूम मधुर संवेदनाओं से नहलाती हुई
धन्यवाद.

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Beautiful poem- touching the heart

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these lines just go deep in to heart and shake our humanity…….amazing

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like rest of your poems this is also simply juicy, every line does mean something. go ahead keep writing the same………….wishes

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हर नन्हा बच्चा एक समुंदर होता है……संभावनाओं का.

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