आओ, अपना देश सँवारें


आओ, सब जनं आओ,

हम सब िमलकर देश सँवारें,
अपना प्यारा देश सँवारें ।
ना हो िजसमें कोई गरीबी,
ना हो कोई भुखमरी ।
चारों ओर हो खुशहाली,
हर खेत में हो हिरयाली ।
हो िबजली-पानी हर गाँव में,

हो सुख-सम्॒रुद्िध हर धाम में,

हो ना कोई बेरोजगार,

हो ना कोई बेघरबार ।
सब लोगों में हो भाईचारा,
हो अपनों-सा ही प्यार नाता,
ना हो कोई भेदभाव,
ना ही हो मन में बैर भाव ।
न आए आवाज बमबारी की
न िकसी के रूदन-िवलाप की,
गूँजे हर ओर बस शांती संगीत,
गाए हर कोई अमन का गीत ।
गाँधी-नेहरू ने िदलाई िजसे
बडी किठनाई से आजादी
उस देश की न होने देंगे
हम िकसी तरह बरबादी ।
जो कोई हम पर आँख उठाए,
तो हम उसकी आँखें फोडें,
दुश्मन पर हम धावा बोलें,
भारत माँ की जय-जय बोलें ।
ं्कंधों से कंधे िमलाकर
कदमों से कदम िमलाकर

हम सब िमलकर देश सँवारें,

अपना प्यारा देश सँवारें ।
- संगीता मूँधडा

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Comments

Indeed a beautiful poem of patriotic feelings with positive loving imagery about the Nation.
Liked it immensely.
The flow is such that this can be sung as a very nice Desh Gaan. Probably it has immerged with its own tune,if so why not render in a Podcast?

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