हे मेरे भारत विशाल


       हे मेरे भारत विशाल,
       हे मेरे भारत विशाल,

पाकर अमरत्व का उपहार,
हो क्यों विचारमग्न हे हिमगिरि जनक,
हो तुम प्राणाधार हमारे,
संचित है तुममें हमारा प्रवाह,
करते हैं हम चरण वंदना हे महर्षि,
           हे मेरे भारत विशाल,

छुआ है तुमने गगन का जो छोर,
उत्सुक है यहाँ आज यौवन भी,
छूने को कोई उन्मुक्त-उन्नत गगन छोर,
गूंजने दो योगीश्वर उनका उन्माद,
            हे मेरे भारत विशाल,

ऋचाओं के समवेत स्वरों से गुंजायमान हो तुम,
करने को थें जब मलिन तुम्हे लुटेरे,
मचल उठे थें शलभ अगणित मिटने को आतुर,
हुए विश्व में अमर उनके गान,
             हे मेरे भारत विशाल,

तुम लोको के देव,
पाई है तुमने वाणी जो मधुर,
गाई जा रही है तुम्हारी यश गाथा चँहुऔर,
करना है अभी हमें पथ प्रशस्त अनेक,
              हे मेरे भारत विशाल,

तुम हमारे उर का ताप,
कर दो उन्मुक्त अपनी फेनिल नदियों को,
होने दो मानस-चिंतन उनके तीरों पर,
पावन-स्तुत विचार हैं हमारा विश्व-परिचय,
              हे मेरे भारत विशाल,

अमृत-मंथन पयोधि के तुम सम्राट,
हैं यहाँ अभी मादक पथ-पद अनेक,
हैं झुका लेने को आतुर अखिल-विश्व को-
हमारा यह हठीला-चंचल-आवारा मन,
              हे मेरे भारत विशाल,
हुए हो प्रस्थित तुम मृत्यु से अमरत्व की और,
प्रज्ज्वलित हो उठे हैं दीपदान से तुम्हारे पावन नीर-तीर,
हे ज्योतिर्मय - सुभाषितम - सत्यम् -शिवम् - सुन्दरम,
दो हमें भी अपनी करुणा का मान,

                    हे मेरे भारत विशाल,
                    हे मेरे भारत विशाल.
         ————–
- नीरज गुरु “बादल’
                   भोपाल,

No related poems.

Comments

देश की महानता का बखान करती एक अित उत्तम रचना ।

[Comment on this comment]

उत्कृष्ट ढंग की कविता, साहित्यिक और सुदर
“पावन-स्तुत विचार हैं हमारा विश्व-परिचय,
हे मेरे भारत विशाल,”
ये अब विश्व मानता है, पर हम ही इन्हे छोड् West का अनुकरण कर रहे है, दुर्दैव और क्या.

[Comment on this comment]

Leave a comment

(required)

(required)