सागर िकनारे


मन चाहता है चली जाऊँ

कहीं दूर सागर के िकनारे

जहाँ कछ भी न हो,

िसवाय गहरे शांत एकांत के ।

िनहारूँ हर सुबह

उिदत होते सूय॔ की

बादलों पर िछटकती

चहकती हुई लािलमा

अलसाऊँ िफर वहाँ

िकसी भीगी चट्टान पर

िबखरी हो िजस पर

नर्म, गुगुनी-सी धूप ।

िभगोऊँ मैं पैर अपने

चंचल, चपल लहरों के

उछलते, कूदते, फुदकते,

शीतल, गुदगुदाते जल में

और महसूस करूँ

पैरों तले िखसकते

बालू के रेशमी

स्वर्िणम कणों को ।

देखूँ मैं साँझ को

डूबते सूय॔ की

लहरों में घुलती हुई

सौम्य, तेजस्वी गिरमा ।

सुनूँ उछलती-टतकराती लहरों का

िनत मोहक आरोह-अवरोह

डूब जाए िजसमें दुिनया की

हर क्लांत, कक॔श ध्विन ।

मन चाहता है चली जाऊँ

कहीं दूर सागर के िकनारे

जहाँ कछ भी न हो,

िसवाय गहरे शांत एकांत के ।

संगीता मूँधडा

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Comments

sangeeta ji
you have captured the feelings of millions of people. well done!it reminds me of lines that I penned many moons ago:

aise manmohak vatavaran mein,
char chand lagaati surya ki kirne,
alsai se thirken jal par,
muskan khelti mere lab par.

tab man mein uthti yah umang,
kaash vah hoti mere sang.

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sunder kavita.

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Thanks everyone

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