दर परदा तो हर गुल से आप कि निसबते थी


दर परदा तो हर गुल से आप कि निसबते थी

क़दमो तक जो आ गये ये उनकी किस्मते थी

 

जला आफताब अपनी हि आतिशे दिल  से

हर ज़र्रे को रोशन किया तपिशे ज़ख्म से

बुझ गया खामोश ये उसकी मुहोब्बते थी

 

दर्द खुद ज़ख्मो का इलाज हुआ है साबित

आह भी आये तो ग़ज़ल सी बन जाये है

बरसे किस बात पे अश्को कि शिकायते थी

 

मोज्ज़आ है इश्क़ का कि अब वो ना रहे वो

जो लैला को देखे मजनु सा गुमान हुआ है

ना मिलो “शकिल” से आईने कि नसिहते थी

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Comments

Wah wah….kya baat hai..

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