फिर वही़ खामोशी वही तन्हाई का आलम


फिर वही़ खामोशी वही तन्हाई का आलम

दूर नग़मा-ए-ग़म पर शेहनाई का आलम

दर्द के साये बढे आते है दिल कि जानिब

मेरी जिन्दगी गालिब से आशनाई का आलम

ज़ख्म बिलखते हुए दर्द मे डूबती सॉसे मेरी

ऑखो के सामने फैला ये रोशनाई सा आलम

दर्द का वो आलम के मरहम से बढे जाए

उस पर ये दुनियॉ कि मसिहाई का आलम

वो खुदा भी भुला है तुझे “शकिल” शायद्

न था कभी वरना यु उसकी खुदाई का आलम

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Comments

nice lyrical poem

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शकील भाई, अभी तक की यह आपकी सर्वश्रष्ठ ग़ज़ल है.यह है एक मुक्कमल ग़ज़ल.गा़लिब को सही रूपांकित किया है.आपका यह शे’र -

ऑखो के सामने फैला ये रोशनाई सा आलम

दर्द का वो आलम के मरहम से बढे जाए,
इस पर मुझे एक शे’र याद आ रहा है जो जगजीतजी ने अपने घर में एक पार्टी में सुनाया था,(यह किसी एलबम से नहीं है,)-
इलाज-ए-दर्द-ए-दिल,मसीहा तुमसे हो नहीं सकता,
तुम अच्छा कर नहीं सकते,मैं अच्छा हो नहीं सकता.

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bahur sunder hai…

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पडकर दिल खुश हो गया,शकील जी

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bhut sunder rchna, pr kr dil khush hua

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bahut hi sundar shakeel ji!

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