प्रेम प्रतिदान
मैं -
प्रेम कर,
सब-कुछ पा लेने जैसा,
पा लेना चाहता था,
और,
इस प्रेम प्रतिदान में -
स्वयं को खो बैठा.
————–
- नीरज गुरु “बादल”
भोपाल.
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प्रेम कर,
सब-कुछ पा लेने जैसा,
पा लेना चाहता था,
और,
इस प्रेम प्रतिदान में -
स्वयं को खो बैठा.
————–
- नीरज गुरु “बादल”
भोपाल.
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थोड़े से शब्दों में, इतनी बड़ी बात कह दी जाए……………..अलग है, सुंदर है, हमेशा की तरह बेहतरीन रचना, सम्भव हो तो विस्तार दें इसे…………
शुभकामनाये।
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