जीवन जो जीया नहीं……


जीवन जो जीया नहीं,
जीया जिसे- उसे जीवन कह न सके,

सीने में लिए एक आग,
धड़कते रहे बनकर पत्थर हम,
न मील का पत्थर बन सके.
न किसी देवालय का देवता बन सके,

चाह बहुत कि कोई छू भर जाए प्यार से हमें,
पर अपने ही मकां में बंद -
न बहारों को बुला सके,
न बहारों तक जा सके,

बनते रहे काग़जों पर इबारतें नित्य नई,
कभी कविता - कभी कहानी की,
अपनी कहानी कोई सुना न सके,
गीत कोई गुनगुना न सके,

शब्दों की तूलिका से छिटके रंग कई,
हर सुबह-शाम जीवन के केनवास पर,
प्रभात-किरण कोई चौखट पर ला न सके,
रात कभी चाँद छत पर उतार न सके,

लिए हथेली पर अपने तप्त आंसू,
पीते रहे अपनी ही गर्म साँसों को,
याद कोई भुला न सके,
छुप-छुपकर रो भी न सके,

जीवन जो जीया नहीं,
जीया जिसे- उसे जीवन कह न सके,
     ————
-नीरज गुरु “बादल”
                  भोपाल.

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Comments

Bahuut hi pyaari rachna…
udaas-udaas si par achhi bhavna.
Ek pyaala aasu ka har kisi ko,
chalte hi raho, kabhi na ruko…

Neerajji dil ko chu gaya…

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इस मंच पर fusion कम ही देखने को मिला अभी तक, आप, विश्व जी, विकास जी और कभी कभी रेनू जी यह कमी पूरी करते रहते हैं, भाषा के अनुबंधों से मुक्त हो कर लिखने वाले कुछ गिने चुने आदरणीय हमारे बीच हैं यह देख कर अच्छा लगता है।

बहुत बहुत धन्यवाद, आपके सहृदय उत्साहवर्धन के लिए……….आप सब आदरणीय बंधुओं का आशीष मिलता रहे, जीवन में सुख बना रहेगा।

:)

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Acchi kavita hai. mukat aap achhe kikhte hai

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