आदमी


 

आदमी

 

 

आदमी को आजकल,

क्या हो गया है

कहता कुछ है .

करता कुछ है, आदमी।

 

वचन,अनुशासन,चरित्र,

की बाते बेमानी हैं

सिर्फ अपने फायदे की ,

सोचता है आदमी

 

बुजुर्गों को कहते सुना था,

झूठ मत बोलो कभी,

अब सिर्फ सच को छिपाने के लिए,

झूठ पर झूठ बोलता है आदमी

 

भूखे बेबस को दान देने के लिए,

हाथ उठते नहीं,

अब तो केवल दूसरे से

छिनने की सोचता है आदमी।

 

परिश्रम़ कर रोटी कमाने की,

बात ही छोडिए,

कैसे  कम से कम काम में,

अधिकतम कमाने की,

सोचता है,आदमी।

 

माता-पिता का आदर करना,

शिक्षक यही सीखा गए,

किन्तु आजकल  उन्हें ,

अपने से दूर करने की,

सोचता है आदमी.

 

बड़ो की इज्जत करो,

हम-उम्र का सम्मान,

सब बातें बेकार हैं,

अब तो वक्त आने पर

सबका गला काटने की,

सोचता हैं आदमी

 

किसी लड़की को देख,

मां, बहन , बेटी, भतीजी का,

ख्याल आना कल की बात है,

अब तो सिर्फ अपनी,

मनोकामना पूर्ति की,

सोचता है आदमी।

 

घर में आई बहू लक्ष्मी होती थी कभी,

अब तो लक्ष्मी को ही ,

वक्त आने पर होम करने की,

सोचता है आदमी.

 

परिवर्तन सदा अच्छा है,

कह गए सुधी लोग,

किन्तु इस तरह का परिवर्तन,

रसातल में ले जाएगा हमें,

इसलिए वक्त से पहले

सम्हल जा  आदमी ।।

 

हर्ष शर्मा

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