आइये निंदा करें……
आइये निंदा करें,
ज़ोर-ज़ोर से करें,
अपने सत्ताधीशों के सुर में सुर मिलाएं,
धमाके करने वाले तो अपना काम करके जा चुके,
मरने वाले भी मर कर जा चुके,
और अब जबकि दोनों ही समाचार बन गए हैं,
और दोनों पर बहस जारी है -
क्यों करते हैं वो धमाके,
कैसे करते है वो धमाके,
क्या मिल जाता है उन्हें ऐसा करके,
कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं
क्या इन्हें रोका जा सकता है,
और वो-
जो मर गये हैं-
क्यों निकले थे घर से,
कितने ग़रीब थें,
कितने लाचार थें,
क्या उनका मरना ज़रूरी था,
और न जाने ऐसे कितने सवाल-
हम करते आए हैं-करते रहेगें
और फिर सब भूल अपने-अपने काम में लग जायेगें,
हमने आज तक किया है ही क्या है सिवाय इसके,
हम ही हैं जो दुःख प्रगट करते हैं,
आक्रोश व्यक्त करते हैं,
न्यूज़ चैनल का हिस्सा बन उनका राजस्व बढाते हैं,
चौराहों पर खडे होकर चिंता करते हुए टाइम पास करते हैं,
नेताओं को कोसते हैं,
और फिर - और फिर,
अगली सुबह होते ही हम हम ही हो जाते हैं,
और ये हमारे सत्ताधीश भी -
हमसे ही शान्ति की अपील करते हैं,
सर्वधर्म भाव से रहने की विनती करते हैं,
चिंता न करने की बात करते हैं,
नई मीटिंग बुलाकर पुरानी घोषणाएं करते हैं,
लाशों की कीमत की घोषणा की जाती हैं,
बिना किसी भाव के घोर निंदा की जाती है,
दुनिया का गिद्ध भी भर्त्सना करता है,
पूरी दुनिया भी उसके सुर में सुर मिलाती है,
तब -
जिन पर दुखों का पहाड़ टूटा है -
उन्हें ही यह बोझ ताउम्र उठाना है,
जिन के शरीरों पर पाखंड-आतंक अपने निशान छोड़ गया है,
जीवन भर वह निशान उन्हें ही ढोना है,
मुआवज़े के लिए रिश्वत खिलानी है,
दर-दर की ठोकरे खानी है,
अकेले में ज़ार-ज़ार रोना है,
और वो सारी बातें-सारे दुःख जो अब कभी सामने नहीं आयेगें,
हमारी कतिपय संवेदनाओं का हिस्सा नहीं होगें,
किसी न्यूज़ चैनल के राजस्व का हिस्सा नहीं होगें,
शासन-प्रशासन की योजनाओं का हिस्सा नहीं होगें.
तब -
आज मौका है,
दुनिया निंदा कर रही है / तो /
आप सबसे अलग क्यों जाते हैं,
आपको भी तो बहुत सारे काम हैं,
तो आइये कुछ तो करें,
निंदा से ज़्यादा कुछ करने को है भी नहीं,
अपने कीमती वक्त में थोड़ा समय निकलकर -
आइये निंदा करें.
—————
- नीरज गुरु “बादल’
भोपाल.
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Comments
Indeed, an outstanding poem.
Intense & apt presentation of the insensitive, entirely sponsorship & advertisement driven, intensely commercial cum political, corrupt environment and what is the state & fate of common man & general public in it.
Neeraj Guru ji…thanks for posting this gem.

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वाह! क्या खूब लिखा है आपने!
पढकर मन प्रसन्न हो गया.
कभी मैंने भी एक कविता लिखी थी कुछ इस तरह की. वक्त हो तो एक निगाह फ़िरायें : http://p4poetry.com/2008/04/03/%e0%a4%a1%e0%a4%ac%e0%a5%8d%e0%a4%ac%e0%a5%87-%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%82%e0%a4%a6-%e0%a4%86%e0%a4%a6%e0%a4%ae%e0%a5%80/
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