लौट चलें


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                        लौट चलें

 

 मन करता है ,बच्चा बन जाऊं

बात -बात पर जिद्द करू

और रूठ- रूठ जाऊं

मुझे मनाने के लिए मां,

मेरे आगे-पीछे घूमे,

मैं दौड कभी पलंग, कभी कुर्सी पर चढूं

दरवाजे के पीछे छुप जाऊं,

 

मौका देख  भैया की

कापी फाड़ू ,फूल बनाऊं

कीचड के पानी में छप-छप करूं

धूम मचाऊं,मां के मना करने पर भी

कड़ी दोपहर में घर के बाहर जाऊं

गिल्ली डंडा खेलूं , पतंग बन उड़ जाऊं

या दीदी के साथ बैठ खट्टी मीठी गोली खाऊं

 

गुल मोहर के पेड़ पर चढ़ मित्रों के संग,

छु--छाई खेलूं 

सायकिल सीखने की कोशिश में गड्डे में गिर जाऊं

मंझली दीदी को पीछे पीछे दौड़ाऊं

गरमी की रातों में घर के खुले आंगन में

दीदी भैया के बीच

सुखद निंदिया का आनन्द बार-बार मैं पाऊं

या फिर सरदी की गुलाबी धूप में छत पर बैठे बैठे

मां करे तेल मालिश  मैं लुत्फ उठाऊं

 

बड़ों के ताश खेलते वक्त बीच बीच में घुस जाऊं

लाख मना करने पर डटा  वहीं रह जाऊं

नई नवेली भाभी को देखूं कौतूहल से

देखूं धानी चुनरी,देखू हरी-हरी चूड़ियां

मां की नजर बचते ही भाभी की गोदी में चढ़ जाऊं

 

स्कूल से मिले होम वर्क को देख

ईश से करू प्रार्थना

किसी और से करवा दे

या फिर अगले दिन टीचर को बीमार पड़वा दे

 

बीता हुआ बचपन कभी वापस नहीं आता है,

केवल तन्हाइयों में तड़पा-तडपा जाता है

­हर्ष शर्मा

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Comments

So true…
gone are the days and all we can do is look back and live throught those memorable times…
Loved it…

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A very beautiful poem indeed.
The lovely innocence of wonderful childhood years beautifully presented in the form of nostalgic memory,

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मेरा बचपन ऐसी ही शरारतों में बीता है.मीठी स्मृतियां.

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