एक और दृष्टिकोण


 

 

 

एक और दृष्टिकोण

 

नर्मदा तट पर विशाल नदी का सौन्दर्य

निहारते तुम्हीं ने समझाया था,

मुझे किनारों का मतलब

वरना मै तो उन्हें

कभी मिलने वाले

साहिल ही समझता,

 

कहा था तुमने ,यह किनारे नहीं बाहें हैं,

मालूम है जब नदी ऊचे पर्वत से नीचे गिरती है

तो थाम लेती हैं ,

नदी को अपने आलिंगन में

जिनमें शांत हो पाती है नदी,

आगे बढ़ने की चाह में

 

फिर इन्ही बांहो के सहारे नदी करती हैं ,

अपनी सीमाएं निश्चित,

उबड़ खाबड़ रास्तों पर बहती हैं चंचल हो

मैदानों में बाहों की गहराई में हो जाती है शांत

बहती है मैदानो में

हरियाली उन्नति विकास के लिए

 

जानते हो  ,

जब भे बाहों का सहारा कम हुआ है

आई हैं विकराल बाढ़

और फिर वापस उतर आई है सरिता बांहों में

बहारों की खातिर

 

जहां से भी हम गुजर गए बस गए शहर

बिखर गईं खुशियां ,

फैल गई हरियाली

जगह जगह खिल गए फूल

 

 

किनारों पर बसे मंदिरों में

शंखनाद हुआ

मस्जिदों में अजान,

लोगो ने मोक्ष पाया है हमारे पास

 

 मैं तो कहती हूँ ,

ये किनारे ही हैं

जो नदी को ले गए

जनजन तक कल्याणार्थ

  

अन्तत: विलिन हो जाती हैं सरिता

अपने प्रिय सागर में ,

एकाकार

                                                                       कहां है अलगाव ?                           

हर्ष शर्मा

 

 

 

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Comments

हर्ष कान्त जी, मेरे विचार में ये अति सुंदर कल्पना में लहराती, अति विशाल परिपूर्ण और उच्चतम दर्जे की कविता है. जितनी प्रशंशा करें कम है.
इस पोस्टिंग के लिए बहुत धन्यवाद और बहुत बधाई

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Agree with Vishvnandji completely.Heart touching

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arase baad itnee sundar kavita padne ko mili hai .
prkirti aur maanav ko jodti hai .

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नर्बदा का अपना सौन्दर्य है और आपकी कविता का अपना सौन्दर्य है.crown poem तो होनी ही थी.

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बहुत सुंदर हॅ.

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