प्यार की कविता

जब किया प्यार मैंने,
शब्द-शब्द मचल उठे,
हो उठे सागर अल्हड़,
और -
तोड़ दे सभी मर्यादाएं उन्होंने,
अपनी सीमा से बाहर यह पवन,
और -
उड़ते हुए बालों की लट ने-
देखा उसे तिरछी दृष्टी से,
और उधर -
मैं डूबा हुआ एक प्रेमिल ज्योति-पुंज में,
तब -
लगा करने अठखेलियाँ,
मुझसे यह अखिल विश्व भी,
ढेरों प्रश्न लिए हुआ यहाँ-वहां,
बहुत कुछ - सब कुछ,
पूछा मुझसे किस-किसने क्या-क्या नहीं,
टोका मुझे सबने कहाँ-कहाँ नहीं,
पर मेरा मन / यह मन,
जिसे माना है सबसे चंचल-गतिवान इस ब्रम्हाण्ड में,
अब खड़ा था एक ही जगह पर,
विमूढ़ ताकता कभी मुझे -
कभी ढूढंता उन चितवनों को,
जिसमें पढ़ी थी उसने -
                                पहले-पहल,
                                प्यार की कविता,
                                पहली बार.
            ——————
- नीरज गुरु “बादल”
                   भोपाल.

Comments

achhi kavita hai tarashane ki gunjaish baki hai

कविता का विषय, कल्पना और भाव बहुत सुंदर हैं.
पढ़ने में मजा आया.

दिल खुश कर दिय आपने. कल्प्ना और भावों के अलावा शब्दोन का प्रयोग बहुत सुन्दर्

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