ग़ज़ल - कुछ तो हुआ है……..
तुम मिली हो,कुछ तो हुआ है,
जिंदगी में तुम्हारा आना, एक दुआ है.
सावन की शरारतें, सावन ही जाने,
ह्रदय तो तेरे प्रेम में भीगा हुआ है.
फूलों की घाटी में, वो तेरी अंगड़ाईयॉ,
खुशबू भरी हवाओं ने, अभी-अभी मन को छुआ है.
मेरी बज़्म-ए-महफि़ल में तेरा आना,
आज फिर एक चिराग़ रोशन हुआ है.
तू न थी तो यह कायनात भी न थी,
अब तू है तो यह कायनात को क्या हुआ है.
मुझे बताओ,किसने तुम्हे छेड़ा है,
मुझसे तो यह आज-तक नहीं हुआ है
तू हवा,तू बिजली,तू घटा,तू पानी,
देख मौसम तेरी गिरफ्त़ में हुआ है.
संग-ए-दुनिया में उनके संग का निशाना हूँ मैं,
तुझसे प्यार किया है,पता नहीं गुनाह कहाँ हुआ है.
लहरों का आमंत्रण है आज तुम्हे,
आज मन मेरा समंदर हुआ है.
कुछ हुआ है,क्या हुआ है मैं क्या जानू,
ये आवारा “बादल” ही शरारती हुआ है.
_________________-
- नीरज गुरु “बादल”
भोपाल
संग - पत्थर .
Comments
कुछ शेर तो बहुत अच्छे हैं पर अगर इजाजत दें तो इतना कहूं कि सबों में इतना आनन्द नही आया जो आपकी हर कविता में आता है
सुंदर कविता और इसके शेर भी.
ग़ज़ल और ग़ज़ल के व्याकरण के बारे में मुझे ज्ञान नहीं है, मगर बादल जी, आपकी ये शरारत और रचना दोनों मुझे तो काफी अच्छी लगी.
ग़ज़ल और ग़ज़ल के व्याकरण के बारे में अगर फॉरम में चर्चा हो तो हम जैसे मेम्बर्स के लिए अच्छा हो.
मेरी ये दरखास्त श्री भगवानदास जी से है.

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