छलावा

छलावा

काफी लम्बे अंतराल के बाद

मेरे मन में कविता फूट रही है

छिपा रखे थे राज सभी वो

आज मुझी पर खोल रही है

क्योकिं मेरे मन में बेवजह

प्रश्न कौंध रहे हैं

जा -जा कर अतीत की गहराइयों से

प्रतिध्वनि बन खाली लौट रहे हैं

छले जाने का दुख

बार बार सता जाता है

खुद में कमी होने पर

हमें छलने का अधिकार

क्या दूसरे को मिल जाता है

तुम्हारे दुख का कारण

मैने अपने को माना

इसलिए हर जतन किए

तुमको खुश रखने के

किन्तु आह———–

क्यों सोचा करता था मैं,

बिन तुम्हारे जी पाऊंगा,

तुमको पाने की लालसा में

लौट -लौट धरा पर आऊंगा

किन्तु आज इतिहास

केवल सपना लगता है

जो कुछ भी आज मिला

वही अपना लगता है———

­हर्ष शर्मा

Comments

Harshji…
Accha likhtein hain…

हर्ष कान्त जी, बहुत खूब.
ऐसी कविता कविह्रदय में पनपते सुंदर भाव से ही निकल सकती है

Shri Harsh Kant ji,

Beautifully written & expressed the feelings nicely.
good.

भावों से परिपुर्ण

सही अर्थों में यह कविता है.अभी जो नए कवि-मित्र लिख रहे हैं, कृपया यह कविता पढ़े.

Extremely sensitive, full of felings and well written

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