सपने और सत्य …इक अनुभूती……!
सपने और सत्य …इक अनुभूती……!
सपनों ने मुझे सपने दिखाकर, इतना भ्रम में था घोला,
सत्य जब आया सामने मेरे, उससे ना मै लड़ पाया.!
सत्य से भागूं भी मै कैसे, सपनों को भी था छोडा,
हार हार कर लड़ा सत्य से, काम यही लड़ना आया.!
सत्य समझ कुछ आया जब, तब सत्य मुझे इतना भाया,
सपने और दुनिया के सच से, असली सत्य अलग पाया.!
दुनिया में जो सच दिखता है, वो कुछ असली सत्य नही,
और सपनों को जो भाता है, वो भी असली सत्य नहीं.!
सत्य तो भगवन सा प्यारा है, सत्य समझ में जब आया,
सत्य से ऐसी द्रष्टि मिली है, सत्य छिपा हर कहीं दिखा.!
सत्य की जो अनुभूती पाई, किसीसे ना रुसवाई मेरी,
सपनों की दुनिया भी मुझको अब लगती प्यारी प्यारी.!
सपनो ने मुझे सपने दिखाकर, भ्रम में जो था यूं घोला,
उसके ही कारण तो मैंने सत्य को ढूंढा और समझा.!
अब तो सपने भी प्यारे हैं, सत्य के सपने मैं देखूँ,
जीवन अब ऐसे जीना है, सत्य में जीवनसुख पाऊँ.!
“विश्व नन्द”
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