ग़ज़ल : हंगामा हो गया


हम ज़रा मुस्कुरा क्या दिए, हंगामा हो गया,
धड़कनें सुनने क्या रूक गए, हंगामा हो गया,

वक्त के हाथों में थी, हालात की शमशीरें,
सिर उठा कर जो जीए, हंगामा हो गया,

यहाँ आदमी होना सबसे मुश्किल है, जब सुना,
हम इबादतखाने जो उठ आए, हंगामा हो गया,

सौदा अक्लियत का, कोई कर न सके हम,
सरे बाज़ार से क्या चले आए, हंगामा हो गया,

लोग तो हैं, कब्रिस्तानों में बस्तियां बसाये,
हम भीड़ से जो अलग हुए, हंगामा हो गया,

बे-वज़ह ही नाराज़ नहीं है, ज़माना मुझसे,
हम आईना क्या हुए, हंगामा हो गया,

इश्क-हकीकी के ज़ुनून में ऐ “बादल”,
तुम शायर क्या हुए, हंगामा हो गया.
         ————–
-नीरज गुरु “बादल”
                  भोपाल

     शमशीर = तलवार (sword)

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Comments

क्या बात है नीरज जी, बेहतरीन
एक ही बात कहूँगा
कोई बात इस तरह से कहे तो हंगामा हो जाए
रंग कुछ इस तरह से दिखे तो हंगामा हो जाए
छु लिया है आज जो दिल के साज़ को
मैं क्या कोई भी बस दीवाना हो जाए

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यह गजल भी हगामा करेगी

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वाह नीरज जी आप तो इतने महान शायर की आपकी तारीफ करते भी डर
लगता है की कही कुछ ख़ता ना हो जाये…..

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बहुत सुंदर, नीरज जी
आपकी ये बेहतरीन ग़ज़ल क्या पढी,
सुंदर कुछ ऐसे और ख्यालों का,
दिल में, हंगामा हो गया.

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