अश्रुदीप


सूरज से दोस्ती नहीं,
चाँद से रिश्ता नहीं,
लिए हथेली भर अंधकार,
आशा की किस किरण से रखूँ वास्ता,
खिड़की बंद किए हूँ मैं,
रूठा पल कोई मानता भी नहीं,
चुप के रहते पास -
बातें करुँ भी किससे,
हाय, यह क्या कर बैठा मैं,
प्रेम में पड़ -
किन शत्रुओं को छेड़ बैठा मैं,
रोशनी तो लूट चुकी,
अब अपने ही -
                       आंसुओं के दीप जलाकर बैठा हूँ.
    —————————-
-नीरज गुरु ” बादल”
                    भोपाल.

 

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Comments

achhi kavita hai.shabdo ka chayan v vishay uttam hai

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बहुत सुन्दर भाव,
सुप्त विचारों से दिल को छूती हुई
उत्तम रचना

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