अक्स


 मित्र निरज गुरू व सुधा गोयल को समर्पित्

 

 

अक्स

 

मेरे मित्रों को अजीब आदत है ,

पहले मेरी कविता को पढ़ते हैं ,

फिर   घूर - घूर कर देखते हैं ,

फिर मुस्कुराकर पूछते हैं ,

क्या आपने कभी प्यार किया था ?

 

उनकी इस हरकत   में ,

कविता की सार्थकता नजर आती है ,

सोचता हूँ मेरा शब्द - शब्द असर कर गया ,

किन्तु मित्र अब तुम जख्मों पर क्या लगाओगे

मरहम , जख्म लगे जमाना बीत गया।

 

इसलिए मत पूछो मेरा इतिहास ,

केवल आंखें बन्द कर

दर्द को महसूस करो

पाओगे खुद को आस पास

सच कहता हूँ मेरी रचनाओं में मुझे

तुम्हारा ही अक्स दिखाई देता है।

 

यार , इसलिए कहता हूँ

मेरी तुम्हारी कहानी एक सी है ,

फर्क इतना है , मै दर्द को

शब्दों में उतार लेता हूँ

शब्दों में उतार लेता हूँ ——

 

­ हर्ष शर्मा

 

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Comments

प्यार आपका, स्वप्न आपके,
ख्याल आपके,दर्द आपके,
शब्द आपके, कविता आपकी,
पढ़ा सबने, सराहा सबने,
इस तरह यह ज़माना आपका,
सब कुछ आपका,हर अक्स आपका,
और - बदनाम मैं खामखाँ हुआ.

आपकी इस कविता के लिए आपको धन्यवाद्,ऐसे ही हमें याद करते रहिये.

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बहुत खूब कहा आपने

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fabulous…
very nicely expressed- sweet and in a subtle way.
काबिले तारिफ भावुक रच्ना रचि है आप्ने…

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अति सुंदर प्रसंगावधान कविता.
वाह! मान गए…!.
“दर्द से दिल की बात छुपी ना,
शब्दों में रच दी कविता,
जो है कहा उससे भी ज्यादा,
गुपित, तो दिल में छुपा लिया ……. !!”

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aapne kavita ke bahaane doston par achchha vyang kiya hai .
bahut sundar likha hai.

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