शीशमहल


जब से शुरू हुआ है -
भ्रमों के टूटने का सिलसिला,
मैं -
छलनी-छलनी हो गया हूँ,
अब रक्तरंजित -
सोचता हूँ यह बैठा-बैठा,
कि यदि -
शीशमहल बना ही लिया था,
तो -
पत्थरों से प्रेम करने क्यों गया था.
   ————
- नीरज गुरु ” बादल”
                    भोपाल.

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Comments

Kyoki,
Patthar ke sanam tujhe humne mohabbat ka khuda jana.
Very beautiful poem…..
Carry on….

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वाह वाह! कम शब्दों में कितना कुछ कह दिया.

(अब आपके पोस्ट करने की समस्या ठीक हो गयी लगती है. सर्वर के स्लो रहने के कारण होने वाली असुविधा के लिये हमें खेद है. हम सुधार की कोशिश करेंगें)

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बहुत खूब, बड़ी बात चुटकी में.
मज़ा आ गया.
जीवन की असली उलझन तो यही है कि शीशमहल और पत्थर दोनों
से दिल प्यार करता है, और दोनों के साथ रहना चाहता है.

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बहुत खूब

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नीरज जी
आपकी इन लाईनो पर एक शेर अर्ज हेः-
“पहरो वो साथ-साथ रहे बुत बने हुए
हम सोचते ही रह गये पत्थर से क्या कहे”
और नीरज जी - खुदा ने कम्बखत दिल चीज ही ऐसी बनाई है
जब भी दिल लगाया है दिल लगाने की सजा पाई है-
by sushil sarna
चन्द लाईनो मे व्यक्त अति सुन्दर भाव-बहुत खूब

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