हमरी रोटी, हमरा काम…..!
( सन १९९८ के चुनाव के माहौल में ये कविता रची थी )
हमरी रोटी, हमरा काम…..!
बन गया कैसा समाज अपना, कैसी ये सरकार चली है,
रोटी देने की तो छोड़ो, हमरी ही रोटी छीन रहें है.
दुष्ट से कोई भेड़िये जैसे, हमरी ही रोटी घूर रहें है……!
नेता जो ये भरे पड़े हैं, देते देशभक्ति के भाषण,
ख़ुद के लोभ में फंसे हुए ये, नहीं छोड़ते अपना आसन,
देशद्रोहियों से ये मिलकर, जनता को ये सता रहें हैं,
देश को अपने लूट रहें हैं…
रोटी देने की तो छोड़ो, हमरी ही रोटी छीन रहें हैं …..!
देश की तो दुर्दशा हो गयी, जाने क्या अब होनेवाला,
हाथ भेड़ियों के है सत्ता, ऐसी हालत, पडा है पाला,
फिर फिर कर अपराध देश पर, नहीं सज़ा कुछ ये पाते हैं
और “बेल” पर छूट रहें है….
हर चुनाव में टिकिटें पाकर, हर चुनाव ये जीत रहें हैं
रोटी देने की तो छोड़ो, हमरी ही रोटी छीन रहें हैं.
अधोगती से देश बचाने, देशवासियों के ही हित में,
हमको ही कुछ करना होगा…
जीना है सन्मान से हमको, डरकर कुछ ना काम बनेगा.
देशद्रोही नेताओं से तो, जमकर खुलकर लड़ना होगा,
चाहे जान भले ही जाए, अब हमको ना रुकना होगा,
जनता की खर्राट को, मिलकर, आन्दोलन में ढलना होगा,
राष्ट्र के हर चुनाव में आगे, नेता सच्चे चुनना होगा,
चाहे जितना दबाव आए, यह कर्तव्य निभाना होगा,
राम ने युध्ध किया रावण से, पांडव ने कौरव से जैसे,
हमें युध्ध अब करना होगा,
इस अपनी एकता में देखो, ये नेता विष घोल रहें हैं,
रोटी देने की तो छोड़ो, हमरी ही रोटी छीन रहें हैं…?
कैसे रोटी ये ना देंगे, कैसे ये रोटी छीनेंगे,
मिल जवाब हम ऐसा देंगे,
भ्रष्ट समाज और नेता जो हैं, उन्हें सबक यूं सिखलाएंगे,
उनकी रोटी हम छीनेंगे….!
ख़ुद के अपराधों से डरकर, दुम दबाकर ये भागेंगे…..!
उनको सबक सिखाने यारों, प्रण ये अब स्वीकार करेंगे,
हक़ अपना हम सिद्ध करेंगे, अब इनको हम ना छोडेंगे.
कुछ ऐसा माहौल बनायें, ये हम सब मिल सोच रहें हैं,
रोटी देने की तो छोड़ो, हमरी ही रोटी छीन रहें हैं…?
5 Comments
Shri Sushil, Renuji, Medhini,
I am thankful & happy that you liked the poem & its content.
I feel, to some extent, the poem is relevant today also.
आदरणीय, कुछ तकनीकी कारणों से में आपकी यह कविता एवं अन्य कवितायें नहीं पढ़ पाया उसका मुझे खेद है.यह सच है की यह कविता आपकी शैली से एकदम अलग है, पर उससे भी बड़ा सच यह है की जब-जब भी कवि-मन को कोई भी परिस्थिति या घटना जो उसके आस-पास घटी हो और जिसने उसे उद्वेलित किया हो और उसका उद्विग्न मन अपने अंदर की हलचल को शब्दों से व्यक्त कर सकता हो तो इससे अच्छा क्या हो सकता है.आपकी यह कविता ऐसी ही है और नए चुनावों की आहट में यह और भी सम-सामयिक लगती है,जिसे सभी ने पसंद भी किया है.सिर्फ प्रेम ही नहीं परिस्थितियां भी हमें प्रभावित करती है. यह कविता उसी के अनुरूप है.

Retired senior engineering, marketing & operations management Executive with Passion for & deeply interested in reading & listening to all varieties of poetry & songs and in particular those rendered in Hindi/Hindustani. Also interested in & love reciting & rendering my own poems/compositions & songs on various subjects, composing tunes for songs and singing. Love to & adept at playing Harmonium as accompaniment to singing & also as accompaniment to others performing.
.......Location: Pune & Mumbai
chunaavon ka sahee aanklan kr shabdon main bahut sunder dhang se aapne kaveeta ko rcha hai. Dhanyayaad.
Aapke dwara meri pankhuri pr diye comment ke liye shukriya. usper aapke sujhaav ko dhyaan main rakhoonga….
thanks
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