लैला :aliteration 2

लैला लहु की लाली लबॊ पॆ लगाएगी॑ .

जालीम जफामॆ जवॉ जिंदगीया जलाएगी॑.

दॆखॊगॆ दिलॆ दिलबर दॊजख दिखाइ दॆगा,

मस्तानॊ महजबिनॊसॆ मॊह्ब्बत ना मिलॆगी.

जान जाएगी तॊ जायॆंगॆ जन्नत , जालिम जाएगी जहन्नूम,

मौतभी मुझॆ मॆरी महबुबासॆ ना मिलाएगी॑.

हुस्न हमॆशा हमारॆ हालात पॆ हसा है,

जालीम जवानी जजबात ना जानॆगी.

खुब खोए खुबसुरत खयालोमे ख्वामखा,

मुझे मेरी महबुबा मयखाने मे मिलेगी.

पल पल पछताओगॆ प्यारमे परवानॊ,

शमा शबभर शरारॊ पे सुलगाएगी.

तसव्वुर तो है तराशू तुम्हॆ ताजमहल की तरहा,

बेवफा बहाना बनाकर बदन बुतसा बनाएगी.

 

महजबिन॒- चांदसा चेहरेवालि, दॊजख-नरक , तसव्वुर- कल्पना

Comments

I like the way you execute your ideas in limited sets of words.It is realy difficilt to pursue such interasting ideas following aliteration.
I have read your both the aliterations, both are amazing.

ग़ज़ल पर आपके प्रयोग ठीक है, पर सच कहूं तो इस ग़ज़ल में प्रयोग के साथ वो बात नहीं बन पाई है जो आपकी पिछली ग़ज़ल में थी,इस ग़ज़ल का काफिया काफी बिखरा हुआ है, पर शायद यह प्रयोग के प्रति आग्रह के चलते ऐसा हुआ है. ऐसा प्रयोग मुश्किल काम है पर करते रहिये और भी कुछ नया करते रहिये.

A commendable second attempt, but short of the excellent first one.
Fully agree with Neeraj ji’s considered comments.

तसव्वुर तो है तराशू तुम्हॆ ताजमहल की तरहा,

बेवफा बहाना बनाकर बदन बुतसा बनाएगी.

waah waah

very good joks

good poem.Spailing mistakes are there.

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