पंछी ऐसे आते हैं…..


कहीं धूप का पहर,
कहीं संध्या कि छाया,
ओढ़ी है ओढ़नी -
श्यामल-श्यामल घुन्घराते बादलों ने,
लालिमामय है अस्ताचल,
जिधर चला है भास्कर,
है गगन करता कलरव,
उतर जाने को है व्यथित -
रश्मि-पुंज शिखरों से,
पहर-पहर सिमट चला है,
दिवसावसान भी आ चुका है,
किनारे-किनारे नीड़ के,
आ जुटी है सभा,
लगता है सब - मौन-निस्तब्ध-निर्लेप-नि:शब्द सा,
परन्तु फिर भी है पड़ती सुनाई -
ध्वनि मधुर-मधुर,
कि कहो - ऐ प्रभा-मंडल,
कैसा लगा समय का पथ अनजान,
थक गए होगे - अब कर लो विश्राम,
देखो , दूर से चला आ रहा है तिमिरांचल,
इस गौधुली बेला में -
उपवन का पावन पर्व हो गया है प्रारम्भ,
जाग उठे हैं क्षणिक-क्षणिक,
पीपल, बरगद,पलाश,नीम,आम………,
स्मरण हो आई है ऊषा -
ऐसा ही प्रारम्भ था उसका,
ऐसा ही प्रारम्भ है संध्या का,
भोर गये रे पंछी,
सांझ ढले - ऐसे आते हैं,
हाँ सच -
             पंछी ऐसे आते हैं.
         ——————
- नीरज गुरु ” बादल”
                    भोपाल.

No related poems.

Comments

अितशय सुंदर । सािहत्ियक द्र्श्िट से भी अितशय उच्च कोिट की संरचना ।

[Comment on this comment]

bahut sundar kavita hai.

[Comment on this comment]

अतिसुन्दर प्रतिभाशाली असली हिन्दी कविता.
सुंदर चित्रण और भाव, हर द्रश्य जीवित हो उठा.
कविता की कितनी भी प्रशंशा करें, कम है

[Comment on this comment]

The use of words and expression is very commendable.
Really nice !

[Comment on this comment]

Leave a comment

(required)

(required)