छलक के कम हो जाए मेरी वफा वो शराब नही
छलक के कम हो जाए मेरी वफा वो शराब नही
बढती जाए छलक के भी तेरी जफा का जवाब नही
जब जी चाहे किताब सी पढ ली जाए मेरी जिन्दगी
सफहो मे रखा ये कोई सुखा हुआ ऐसा गुलाब नही
एक वो दिन थे के निगाहो के तार ना टूटा करते थे
अब गुज़रे सामने से तो कोई सलाम कोई आदाब नही
दिल मे अगर सुकुन है तो मौत भी हसीन होती होगी
मेरी जिन्दगी को मै क्यो न कह दु के ये आजाब नही
मुश्किलो के आगे खोल दिया दरवजा किस्मत ने मेरी
किस से कहु के ये मेरा खान-ए-जुल्मत जनाब नही
हर नज़र मे छुपा एक नश्तर प्यासा सा मिलता है
दिल ये भी जनता है के ये कोई बुरा ख्वाब नही
दिल को बेहलाने खाली बोतलो से पानी पिया करता हु
गमे-दिल को बेहलाने जेब मे किमते शराब भी नही
निन्द से जागू कभी और ये ज़ख्मे-जिन्दगी ना मिले
ऐसा जिन्दगी मे अभी होने वाला कोई इन्क़लाब नही॓
फल्सफे सारे किताबो मे मुह अपना छुपाए फिरते है
बढता जाता है कम होता कही ये गमो का सैलाब नही
पानीयो का जिस्म सेहलाता रहा एक उम्र मै शकील
और ऐसा कोई लम्हा नही जो प्यास से बेताब नही
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Comments
इस शानदार ,मुकम्मल ग़ज़ल के लिए मेरी मुबारकबाद,हर शे’र शानदार है,,,,,( बस एडिटिंग पर ध्यान दें,मात्राओं का ख़लल लफ्ज़ों की रवानगी को रोकता है.)
Really nice but as Neeraj mentioned….just work a little more on the spellings…it is just a matter of mastering the keyboard:) and then it will be perfect !

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good work,
keep it up
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