चलो……थोड़ा-सा रूमानी हो जायें


चलो, थोड़ा-सा रूमानी हो जायें,
बैठें कहीं चलकर,
डाले हाथों में हाथ,
आंखों से करे बात,
रहे चुप - हो निस्तब्धता घनी,
तुम उतरो मुझमे,
मैं समाऊ तुममें,
छोड़ सब किस्से - सारी कहानियाँ,
तोड़ बंधन इसके-उसके,
सुबह-शाम के घेरे से बाहर,
पीछा करती आंखों के भय से मुक्त,
पूनम की झिलमिलाती निशा के आँगन में,
जिसकी मुंडेर पर चाँद टिका हो,
वहीँ चांदनी के बिछोने में,
आओ - हम-तुम श्वांसों के अनगढ़ खेल खेलें,
स्पन्दन की मरू उड़े - प्रेम की बयार में,
घुंघरू-सा खनक जाए स्पर्श के एहसास में,
सितार-सा बज उठे साँसों की झंकार में,
कि फिर तू कहे कि - तू है,
कि फिर मैं कहूं कि - तू है,
तो चलो - मोक्ष के इस या उस पार हो जायें,
चलो -
थोड़ा-सा रूमानी हो जायें.
—————-
- नीरज गुरु ” बादल’
भोपाल.

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Comments

बहुत सुंदर कविता, सुंदर कल्पना
प्रेमभाव का सुंदर विवरण.
बहुत बधाई.

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वाह ….बहुत ही सुन्दर

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सच कहा है विश्वन्द जी और रेनु जी ने बहुत सुन्दर कविता है आपकी लाजवाब…..

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a poem with lovely feelings-no words-beautiful

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