शाश्वत-पाप


प्रिय,
सुना है मैंने,
लोग कहते हैं कि -
प्रेम ही होता शाश्वत,

और प्रिय,
सुना है मैंने,
लोग ही हैं यह,
जो कहते हैं कि -
प्रेम होता है पाप,

तो सुनो प्रिय,
इसी दुनिया के -
इन्हीं लोगों के बीच,
इनके - उनके कहने - सुनने से परे,
क्या तुम चलोगी / साथ मेरे,
प्रेम के इस ” शाश्वत-पाप” के पथ पर.
       ———————
- नीरज गुरु ” बादल’
                   भोपाल.

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Comments

अति सुंदर.
प्रेम, पाप और पुण्य का मार्मिक विवेचन और अच्छा solution.
वाह.

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