पी पी के सिगरेट…!


 पी  पी  के  सिगरेट…!

पी  पी  के  सिगरेट,
तंग  हो  गए  “लंग”  मेरे,
फिर  भी  न  आई  आजतक  “वो”  संग  मेरे…!

धत  तेरी,   सिगरेट  की,
क्या  तरकीब  लायी,
हो  गया  मै  “फेल”,   जब  “वो”  पास  आई…….!

छोड़  दो  सिगरेट,
इसी  में  है  भलाई,
ये  गले  पड़ती  है,   लड़ती  है  लुगाई………!

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Comments

बहुत ही सुंदर!आज कल सब सिगरेट पर कविता लिख रहे है,मुझे लगा की अगले कांटेस्ट का थीम है…|

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आपकी इस तरह की कविता का एक अपना अलग आनंद है,एक अलग अंदाज़ है.मैं p4poetry के कविओं ( including me ) से कहना चाहूगाँ की यदि किसी और के पास भी ऐसी रचनाएँ हो कृपया पोस्ट करें.कविता सिर्फ गंभीरता का नाम नहीं है.

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well written…

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