शहर का सूरज


शहर का सूरज,
गायब हो गया है / या /
कहीं खो गया है,
बस सुना ही सुना है कि  -
आसमान में एक सूरज होता है,
अब न जाने कहाँ क़ैद हो गया है,
यह भी सुना है मैंने कि-
शहरों में सूरज नहीं दिखता है,
पर मन कहता है कि,
उसे कोई देखता नहीं है / या /
देखने नहीं दिया जाता है,
इन दौड़ती-भागती सड़कों पर,
किस बच्चे को फुरसत है कि -
वह आसमान कि और ताके,
बुढ़े होने तक वह,
रात-दिन में अन्तर नहीं कर पता है,
पर इस दौर में -
एक अलगाव है सारा,
बे-मानी हैं बातें,
इमारतों - कारखानों कि धुंध में,
उस शर्मीले - से सूरज ने -
लगता है कि - ख़ुद शहर आना छोड़ दिया है.
      ———–
- नीरज गुरु ” बादल”
                    भोपाल.

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Comments

वाक़ई बह्तरीन गुरुगजी

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सच कहा आपने|बहुत सुंदर|

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