समय


समय को लिखा जाए / या /
समय को पढ़ा जाए / या /
समय को गढ़ा जाए,
समय समझ में नहीं आता है,
समय की ही बात है,
समय से बंधा हुआ मैं,
समय की लक्ष्मण-रेखा खींच लेती है एक और रेखा,
और / अपनी ही सीमाओं में क़ैद -
समय अपना खेल दिखता है,
बीता समय अर्थात इतिहास -
स्म्रतियों का चाहा-अनचाहा बोझ,
जबकि / सबकी तरह,
मैंने भी कुछ नहीं सीखा है इतिहास से,
समय-समय की बातें भी नहीं सीख पाया हूँ मैं,
हमेशा अतीत का रोना रहता है,
वर्त्तमान मैं उलझा रहता हूँ,
और / भविष्य की चिंता खाए जाती है,
समय गुजरता जाता है,
बीता समय फिर नहीं आता है,
समय का ही फेर है यह / कि /
समय-चक्र आज भी है मेरे सामने,
और आज भी मैं -
समय को समझ नहीं पाता हूँ.
          —————–
- नीरज गुरु ” बादल”
                   भोपाल.

 

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Comments

सबकी यही विडम्बना है ….

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“समय” पर एक बहुत अच्छी कविता.
कविता में विचारों का विस्तार, उत्तम.

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