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काल चेतना

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Hindi Poetry

अन्धकार से परे
विचारों  से परे
अहसासों से परे
अहसानों से परे
अभिमान से परे
विरक्ति के समीप
शक्ति के समीप
भक्ति के करीब
तुम्हारे भक्त
और
विरक्ति से परे
अभिव्यक्ति से परे
शक्ति से परे
भक्ति से परे
रौशनी में बसे
शुद्धता में रचे
तुम
फ़िर भी है
व्याप्त
हर अभिव्यक्ति में
हर रचना में
तुम्हारी ही चेतना
फ़िर
स्तिथि पसोपेश की
किससे दूर जाने की राह
किसके पास आने की चाह
जब सर्वत्र हो तुम
तुम्हारी चेतना
और उसमे ओतप्रोत
काल चेतना
डा. विमल शर्मा

One Comment

  1. Renu Sharma says:

    dr. sharma ji aapki kavitaa sabke sir ke upar se nikal gai hai .
    bahut achchhi kavitaa likhi hai .
    kripayaa sadhaaran kavitaa lihkiye .
    kaal chetanaa ko har koi nahi samajh saktaa ,

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