मुकम्मल हो तेरा जहान
मुकम्मल हो तेरा जहान
ना हु मैं तेरे दिल में,
मेरे होठ नही समझते…
बोल ना दे तुझे कुछ,
यह सोच के डरता हु मैं|
इस मेज़ पर गिरे आँसुओं में
दिखती है तेरी आँखें…
अब महफूज़ रखना चाहता हु इन्हे,
ईस रूह के हर कोने में|
समझ ना पाएगी तू,
दुःख से काप उठता हु मैं…
छाती थरथरा उठती है मेरी,
जिंदगी से यूह रूठा हु मैं|
बस…
अल्लाह से अब यही दुआ है मेरी,
रो दे ना दर्द से कभी आँखें तेरी…
सुख की बन सहेली,हरदम मुसकुराते रहे तू,
मुकम्मल हो तेरा जहान|


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Aah.will write something new soon.
achchhi praathnaa hai.
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