अनकहा लगाव


जीवन की कुछ घटनाएं , भूले नहीं भुलातीं ,

अतीत की गहराइयों से उभर - उभर के आतीं

 

 

कक्षा में लड़की पढ़ती थी ,

सांवली - सलोनी अच्छी लगती थी ,

सीट उसकी कुछ दूर थी , फिर भी ,

बात करने की कोशिश करती थी

 

 

मैं भी उसको खूब सताता ,

जानबूझ के अनदेखा कर जाता ,

वह प्यारा सा उत्तर देती पास ,

पीठ मोड़ , अनदेखा कर देती

 

हिसाब बराबर हो जाने पर

उसकी मुस्कान मुझे खलती थी

मीठी - मीठी शरारतों से

रात - दिन यूहीं   छलती थी

 

 

मुझे पता था आत्मनिर्भर ,

स्वाभिमानी लड़की है , किन्तु

जीवन में आगे बढने की

ललक उसकी बडकी है

 

मुझे दूसरी से बातें कर देख सहन नहीं कर पाती

झट बहाना मार , वह पास हमारे आती

मैं , भी अपनी सफलता पर मन ही मन मुसकाता

जलन - महक का आनन्द बार - बार मैं पाता

 

मित्रों , ने उसकी इस हरकत को भांपा था

इसलिए , तो मुझे बात - बात पर आंका था

मेरे और उसके हर कदम पर निगरानी थी

शायद उसने इसलिए सबको जलाने की ठानी थी

 

 

मुझे अकेला पाकर खूब - खूब बातें करती ,

भरी क्लास में किन्तु , पीठ मोड़ अनदेखा करती

मैं उसकी हर हरकत को तौला करता था

इसलिए मन ही मन में तौबा करता था

 

 

कुछ ही वर्षों में हम अलग - अलग हो गए

पुराने मित्र जाने कहाँ खो गए

आज भी उस लगाव को भूला नहीं पाया हूँ

चंद यादों को दिल में संजो - संजो लाया हूँ  

 

                                                                       हर्ष शर्मा  

                                                                   

Extract from my old diary

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Comments

bachpan ki yaden kabhi nahi bhulteen .achchhaa lakha hai.

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वाह भई. कौन थी ये नहीं पूछूँगा. :)

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well written with a great flow

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A very beautiful poem of lovely feelings

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कौन थी यह मत पूछो,क्योंकि सबके साथ कभी न कभी, कोई न कोई साथ ज़रूर था,अब यादों में है-ख्यालों में है,कवितायों में है.एक अच्छी कविता है.

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