अन्तरमन की आवाज—–
अन्तरमन की आवाज —–
उस रात छत पर ,
चांदनी रात में ,
औधे लेटे लेटे ,
किसी ने अचानक कहा चलो चलें फिर ,
घर के आंगन में लगे नीम तले ,
बान की खाट पर पड़े पड़े
फिर निहारना ,
गिलहरियों की हरकतों को ,
या फिर उन्हें पकड़ने की नाकाम ,
कोशिश करना ,
बागीचे में लगे फूलों पर बैठी ,
तितलियों को पकडना ,
हथेली पर बिठा उड़ा देना ,
उन्हें इद्रधनुष की तरह
गर्मियों की आहट में ,
फिर महसूस करना
अमराई की भीनी खुशबू
पलाश का चटक लाल रंग
होली पर मल - मल लेना
तन बदन पर ,
कोयल की मधुर तान में ,
खो जाना फिर कहीं ,
आम के मौसम मे ,
पानी की टंकी में पडे ,
आम चूसना मदमस्त होकर
या फिर पीपल की पत्ती ,
की पूंगी बना निकालना मधुर संगीत
पहली बरखा की सैंधी खुशबू
उतार लेना तन बदन में
हरी - हरी नई उगी घास की
महक महसूस करना शिद्दत से
कमरे में बने चिड़िया के घोसले
को देखना पंजों के बल ,
उचक उचक के
मैंने कहा , तुम्हारा आमंत्रण अच्छा है ,
पर कहां से लाओगे मेरा आंगन ,
वो नीम का पेड़ ,
बान की खाट तो इतिहास हो गई है ,
गिलहरियां दिखाई नहीं देती हें ,
शहर में अमराई नहीं होती
अलबत्ता कोयल की कूंक सुनाई देती है
सिमेंट में दब गई है माटी की खुशबू
घर में चिड़िया दिखाई नहीं देती है ,
तितलियो की तो बात ही छोड़ो ,
फूल - फूल बिकाऊ हो गए हैं ,
पलाश तो हाई - वे पर दिख जाते हैं मगर ,
आज की पीढ़ी के लिए अनजान हो गए हैं ,
चूसने वाले आम के लिए तरस गए हैं हम
लगता है , प्रकृति कुछ नाराज हो गई है ,
क्या तुम मेरा गया वक्त वापस कर सकते हो ?
उसने कहा वक्त नहीं जाता कहीं ,
केवल बदल जाती है हमारी सोच ,
उठो , प्रकृति को बुलाओ अपने पास
फिर रोपो कहीं एक नन्हा पौधा
तैयार हो जाएगा नया उपवन
फिर बनाएगी पेड़ो पर
गोरैया अपना घोसला
निराश मत हो , नीम पर फेर आएगी
वही गिलहरी अपनी अठखेलियों के साथ
सोचो कभी हमने दिल से किया है प्रयास
उठो , अपने दोनो हाथें को उठा हवा में
महसूस करो प्रकृति को तहेदिल से
पाओगे वही सब कुछ
जो छोड़ आए थे बरसों पहले ,
कहीं आस पास
हर्ष शर्मा
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I am a 50 years old commerce post graduate from Bhopal(MP).Presently working as Senior Manager(Rajbhasha) in Bank of Maharshtra Pune(MH)
बहुत ही भावुक एवं खूबसूरत रचना है. जिस तरह से आपने शब्दों को मरोड़ा है, मन सच में बचपन में दौड़ गया.
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