Moods of Rain

  वर्षा

पिघला देने वाली भरी दुपहरी में,

खुशी-खुशी कृषक को,

हाड-तोड मेहनत करते देख्,

कादम्बिनी की गोद से उछल, कूद पडी वर्षा,

खेतों में खलिहानों में….

फैल गई, पसर गई, लोट्-पोट होने लगी,

कृषक की मुस्कुराहटों पर्…..

 

छपक्-छपक दौडते इतराते बच्चों के संग्,

बच्ची बन कर वर्षा ने..

अनगिनत कागज की नावों पर सवारी की..

खूब हंसी खन्-खन्…खनन्-खन्…

काले कलूटे, नंगे व मासूमों के साथ ,

गाने लगी सुर से सुर मिलाकर्…

टप्-टप्…..टप्-टप्…….टप्-टप्……

 

परन्तु आज्…..

 

व्याकुल् परेशान् उदास है देखकर छतविहीन

झोपडपट्टियां…

ढॉप लिये हैं, झर्-झर झरने वाले वाले सभी तीर्

घमस बढ गई है, न अंधेरा है न उजाला,

कर्कश बिजली व बादलों का शोर ,

आतन्कित किए देता है…

पर गीली लकडी, भीगे बिस्तर ,भयानक अंधेरा…

नहीं बरसने देता उसको,

आज झर्-झर्……झर्-झर्…. झरर्…….झर्…….

सुधा गोयल्

 

 

Comments

बहुत ही अच्छी तस्वीर रचाई है आपने वर्षा की

बहुत सुंदर कविता और गहरे विचार.
बहुत खूब.

बारिश के अन्तर की चीत्कार आपने भली भाँति प्रदर्शित की है. कारुणिक एवं सुंदर.

Very good poem about rain.

अति सुन्दर व मार्मिक्,एक नया दृष्टिकोण, शरद ऋतु पर् कविता का इन्तजार रहेगा

जून माह की कविता चुने जाने पर आपको शत्-शत् बधाईयाँ.मैं भी भोपाल से हूँ और मझे मालूम हुआ है की आप भी भोपाल से हैं सो इस हसीं शहर की और से भी आपको बधाईयाँ.

marvelous piece of work…deserves to be the winner poem.

इतनी सुन्दर कविता के लिये आपको धन्यवाद और बधाई

वर्षा के दूसरे रूप की सुन्दर कविता के लिये आपको धन्यवाद और बधाई

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