मूल्यांकन

जब कोई दोस्त हो हालेदिल पूछने को तो ये कविता आंसू बन कर ह्रदय से बह जाती है, और कभी कभी वो सच भी अनजाने ज़ाहिर हो जाते हैं जिन्हें हम बरसों छुपा कर रखते हैं……

मन का दर्पण टूटा,
टुकड़े घटनाएं बन कर बिखर गए,
मुड कर देखा तो
बिम्ब अधूरा था,

कुछ क्षण विलुप्त थे शायद?
किसने चुरा लिए?

मनमीत ने?
जो दर्पण तोड़ गया,

उसे मन की पोटली में,
कुछ ले जाते देखा था,

वही अमूल्य क्षण…………………..
जिन पर अधिकार दोनो का, समान

तो मैं ही वंचित क्यों,
क्यों था नतमस्तक?
सिर झुकाए,
विचार इतने भी भारी न थे?

पर हाँ मैंने भी कुछ छुपाया था,
बस दो मोती आंखों में,
और एक स्वर्ण हृदय,
उसे तो आभास भी न था,

दो आँखें,
विरह की पीडा लिए,
छलकने को आतुर,

और वो कह गया,
जाते-जाते, मुझे

निष्ठुर……………….

Comments

यह पीड़ाएं ही है जो जीने का निमित्त बनती हैं.

वाह वाह! मन काढ़ कर रख दिया है.

बहुत सुन्दर रचना है

Very beautiful poem, indeed..!!

perheps you earned a regular reader.
congratulations

nice one

जिस दीपक के नसीब मे जलना लिखा होता है,उसे कोई आन्धी नही बुझा सकती,और उसका तेल भी कभी खत्म नही होता..
कभी - कभी दर्द को भी जीने की वजह बनाना पङता है…

good one ,nice i like ur work.

amazing thoughts……..nice analysis of condition

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