रथ-चक्र


नहीं जानता मैं किसी अंत की दिशा,
भाग्य का यह रथ-चक्र,
धसाँ हुआ है काल की जिस गीली मिट्टी में,
जबकि जानता हूँ की -
नहीं आयेगा कोई अर्जुन / वध करने मेरा,
यह कैसी पीड़ा - यह कैसी बिडम्बना है,
जीवन है - मैं हूँ और यह कुरुक्षेत्र है,
अपने प्रारब्ध के आगे नतमस्तक मैं,
किसी अदृश्य-अजानी-रहस्यमयी -
अर्चना में लगा हुआ मेरा मन,
छटपटा रहा है -
अपने कर्म और भाग्य के साथ,
काल की इस गीली मिट्टी से मुक्त होने के लिए.
    —————

-नीरज गुरु ” बादल”
                   भोपाल.

 

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Comments

“अपने प्रारब्ध के नतमस्तक मैं”

लगता है कोई शब्द छूट गया है. आपने “अपने प्रारब्ध के आगे नतमस्तक मैं” लिखना चाहा था शायद.

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अर्चना में लगा हुआ मेरा मन,
छटपटा रहा है -
अपने कर्म और भाग्य के साथ,
काल की इस गीली मिट्टी से मुक्त होने के लिए.

….बहुत अच्छी लगी य पन्क्तियां

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प्रिय विकाश, आपने सही कहा है, वह भूल मैं सुधार दी है.इस और ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद .

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