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प्रेम-दीप

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Hindi Poetry

प्रिय,
उतरो तुम मन में मेरे,
इन उमड़ती – घुमड़ती घटाओं के मध्य –
पावस की बूँदें बनकर,
और प्रिय,
इस भीगे मन की खिड़की में रखा,
मेरा प्रेम-दीप –
अब प्रज्ज्वलित हो जाने दो उसे,
  ————
– नीरज गुरु ” बादल”
                   भोपाल.

4 Comments

  1. Gaurav says:

    अति सुंदर…………
    भावुक और प्रेमालिप्त

  2. Vikash says:

    संक्षिप्त एवं सुंदर

  3. VishVnand says:

    सुंदर कल्पना
    बादलजी, ये आपका प्रेमदीप अजीब है,
    पानी मे और पानी से प्रज्वलित होता है.

  4. renu rakheja says:

    बहुत खूब

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