नदी - मैं …और सभ्यता.


[ यह सिर्फ एक कविता है, कृपया इसे पर्यावरण-दिवस से न जोड़े,क्योंकि मेरा मानना है कि पर्यावरण हमारी  प़कृति   है और इसे  संजोये रखना हमारी प्रकृति होना चाहिए न कि उसे बचाना हमारा कर्तव्य.]
मेरे बचपन में,
नदी मुझे मुहँ चिढ़ाती थी,
कल-कल कर बहती थी -
रुनझुन - रुनझुन कर गीत सुनाती थी,
थप-थप थपकियाँ देकर लोरियां सुनाया करती थी,
जितना दौड़कर मैं उसे छूने जाता था,
उतना ही मचलकर /  मचलती लहरों से वह मुझे मुहँ चिढ़ाया करती थी,
मैं नन्हा / उसके किनारे पर ठिठक - ठहर जाता था,
और वह / प्रवाहमय हो जाती थी,

समय बीता ,
मैं समय के साथ-साथ बड़ा होने लगा,
और -
नदी बूढ़ी होने लगी,
अब नदी मुझे कभी-कभी सूखी मिलती,
मैं खुश होता / और / उसे मुहँ चिदाता,
उसकी रेतिल छाती पर -
यहाँ - वहाँ दौड़ा फिरता,
गर्वित उस पर घरौंदें बनाता,
हठीली मुस्कान के साथ -
अकड़-अकड़कर चलता था,

समय फिर / और बीता,
समय और सभ्यता के झोंकें में -
मैं और बड़ा हो गया,
नदी और - नदी और बूढ़ी हो गई,
अब तो हम-दोनों -
यदा-कदा वर्षा में ही मिलते हैं,
वह कल-कलकर -
मंद - मंद मुझे देखकर मुस्कुरा देती है,
और -
मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा देता हूँ,
उधर,
उसकी कलकल करती लहरों पर -
हमारी अल्हड़  स्मृतियाँ  थिरकती रहती हैं,
शेष तो -
हम-दोनों ही अब -
एक-दूसरे के किनारे पर बैठे-बैठे,
एक-दूसरे की उदासियाँ बाँटा करते हैं,

आज -
सभ्यता हमें मुहँ चिढ़ाती है.
——————-
- नीरज गुरु “बादल’
भोपाल.

No related poems.

Comments

” हम-दोनों ही अब -
एक-दूसरे के किनारे पर बैठे-बैठे,
एक-दूसरे की उदासियाँ बाँटा करते हैं,

आज - सभ्यता हमें मुहँ चिढ़ाती है.”

भावुक व झकझोर देने वाली रचना है. पढ़ाने के लिये आभार.

[Comment on this comment]

बहुत ही सुंदर रचना है….

[Comment on this comment]

“यह सिर्फ एक कविता है, कृपया इसे पर्यावरण-दिवस से न जोड़े,क्योंकि मेरा मानना है कि पर्यावरण हमारी प़कृति है और इसे संजोये रखना हमारी प्रकृति होना चाहिए न कि उसे बचाना हमारा कर्तव्य”

kafi sundar rachna hai.

[Comment on this comment]

Congratulations ! Your poem has been selected as “Poem Of the Day”

[Comment on this comment]

Its a very nice poem.

[Comment on this comment]

आप सभी सुधीजनों का बहुत-बहुत धन्यवाद. आप सभी की प्रतिक्रियाएं मेरे लेखन पर एक गुरुतर उत्तरदायित्व को बड़ा रही हैं, जिसके लिए मैं आप सभी का आभारी हूँ. सदैव अच्छा लिखने का प्रयास किया है,यही प्रयास आगे भी बनाये रखूगां,और इस तरह आप जो मित्र मेरे जीवन से जुड़ रहें हैं उसके लिए p4poetry का भी आभारी रहूगां. पुनश्च: आप सभी को धन्यवाद.

[Comment on this comment]

Leave a comment

(required)

(required)