लिखा होगा जब तुमने……..नाम मेरा,
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
कितने दिनों धड़कता रहा होगा ह्रदय तब,
कितने पल गुजरे होगें मुहँ में ऊँगली दबाए,
अपने ही विचारों में गुम - खाई होगी डाँट अम्मा से,
टोका होगा किसी बच्चे ने भी तुम्हे तब -
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
चांदनी रातों को टहली होगी छत पर,
ठिठुरती सर्दी में भी ओढ़कर रजाई,
शरमाई होगी तुम जब-तब प्यार की तपिश से,
दी होगी जब आवाज़ किसी ने नीचे से,
कैसा रहा होगा वह शिशिर तब -
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
बिस्तर पर लेटे हुए जब तुमने बदली होगीं करवटें,
आहट पाकर आने की किसी की,
लेटे-लेटे ही कर ली होगीं बंद आँखें,
या चुरा ली होगीं आँखे, पूछने पर कि क्या हो रहा है,
तुम्हारी असीम धड़कनों का उठा होगा तूफान तब,
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
मिलन को रहा होगा उत्सुक यह मन,
हर ढलती शाम तुम्हारी आंखों ने देखी होगी एक राह,
तुम्हारे कानों ने को रही होगी एक आहट कि प्रतीक्षा,
निंदिया रानी को बुलाया होगा तुमने,
फिर भी रात काटी होगी जागकर सपनों में,
सुबह कि उनींदी आंखों में तब रहा होगा नशा कितना,
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
न घर में, न गाँव में,न मेले में, न अकेले में,
न अकाम में, न काम में,न अपनों में, न परायों में,
होते हुए भी तुम रही नहीं होगी इनमें से किसी में भी,
धरती में रोपे गए बीज की तरह,
कितने आतुर अंकुर फूट निकले होगें तम्हारे ह्रदय में,
बाहर बाग़ीचे में दिया होगा फूलों ने उलहाना तब तुम्हे,
लिखा होगा जब तुमने,
किसी धूल भरी सतह पर - नाम मेरा,
प्रिय की दुरी निष्ठुरता लगी होगी तुम्हे,
उड़ते धवल हंसों को रोकना चाहा होगा तुमने,
कहा होगा आच्छादित मेघों से बुलाने को मुझे,
उठते होगें तुम्हारे आतुर उर के ज्वार,
चाहती होगी एकाकीपन तब तुम,
मेरा विचार, मेरी बात, मेरा सपना, मेरा साथ,
क्या-क्या नहीं चाहा होगा तुमने,
तो कहो प्रिये ! क्या हुआ तब फिर -
लिखा था जब तुमने,
एक धूल भरी सतह पर - नाम मेरा.
————————
-नीरज गुरु “बादल”
भोपाल,
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Comments
Bahut hii sunder kavita hai aapki.
Kavita ke pravaah aur vistaar ne bada sunder mahaul bana dala padhte wakt.
apki kavita iss tanav bhare jeevan me ek sukun aur rahat deta hai.
thanks for this lovely poetry.
keep it up sir
may god bless u.
आप सभी सुधीजनों का बहुत-बहुत धन्यवाद. इससे ज़्यादा शब्द मेरे पास हैं नहीं कुछ भी कहने के लिए. पुनश्च: आप सभी को धन्यवाद.

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सुंदर कविता! कल्पना का विस्तार साफ़ साफ झलकता है.
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