वो प्यास, ये नहीं …

प्याले  पे  प्याले  पी के  भी,  दिल  में  वही  कमी..
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,  वो  प्यास  ये  नहीं …

क्यूँ  आए  हैं  दुनिया  मे,   और  क्या  काम  है  मेरा,
ढूंढें  न  मिल  रही  मुझे,   मेरी  जगह  कहीं..…
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं…

चाहा  था  कभी  खो  सकूँ  कोई  ऐसे  गीत  में…
उस  गीत  की  तो  धुन  भी  अभी  तक  सुनी  नहीं….
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं ..…

ये  दिल  तड़प  तड़प  के  परेशान  है  मेरा ..
क्यूँ  ये  तड़प  रहा  है,   इसे  ही  ख़बर  नहीं ..
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं ..…

दिल  ढूँढता रहता  क्यूँ  वफ़ा,   इस  जहान  में…
जो  ख़ुद  ही  बेवफाई  के  बिना  है  खुश  नहीं …
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं ..…

हर  इक  खुशी में  क्यूँ  नजर  आते  है  गम  यहाँ…
हर  गम  की  गहराई  में  क्यूँ  खुशियाँ  छिपी  हुईं ..
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं ..…

अफसोस  है  कि  यूं  ही  जिए  जा  रहा  हूँ  मैं..
ख़ुद  से,  खुदा  से,  दूरी  भी  कुछ  कम  हुई  नहीं….
पी  कर  के  प्यास  बुझ  सके,   वो  प्यास  ये  नहीं ..…

प्याले  पे  प्याले  पीके  भी,  दिल  में  वही  कमी..

” VishVnand “

Comments

दिल प्रसन्न हो गया आपकी यह कविता पड़ कर

superb.
चाहा था इस कविता पर कुछ comments करूं
उस लायक मुझे कोई शब्द मिला नहीं

always a pleasure reading your work,sir.

सही अर्थों में यह एक प्रवाहमान कविता है, एक शे’र अर्ज़ है -
होगें तेरे सबसे क़रीब हम, यह ख्याल था हमें,
लमे हाथ जाते-न -जाते,सब ख़्वाब टूट चले.

Congratulations ! Your poem has been selected as “Poem of the Day”

antheen pyaas ki baat aap kar rahe hain.vah to kabhi nahi bujh sakti.ati sundar

Shri Anand Ji,
es ek kaveeta se hmaree pyaas bujh jaye, hamari bhee yeh wo pyaas naheen.ek kisaan kee trah hmain aapkee kaveeta roopee badal ka intzaar rahega. hm yeh chahte hain hamaaree yeh pyaas kabhee na bujhe aur aap kee kavitaoon ka sawan hmare hriday ke aangan main brasta rahe. Thanks.
Further thanks for your comments passing for Pankuri.

beautiful thought & beautifully got the words with a exact flow..
awesome buddy… go ahead…

Beautiful…
introspective…
your poem rocks…

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