कब -तक ?


जीतेगें दांव या हार जायेंगे -
यह सोच ज़िन्दगी को दांव पर लगाया ही कब था,
कोई रूठेगा या मान जायेगा -
यह सोच प्यार किया ही कब था,
खुशी के होंगे या ग़म के होंगे -
यह सोच आंसुओं को बहने से रोका कब था,
फूल मिलेंगे या कांटें मिलेगें -
यह सोच डालियों को स्पर्श से रोका कब था,
मंज़िल मिलेगी या भटक जायेगें -
यह सोच पगडंडियों पर जाने से रुके कब थे,
रहेगें कल या चले जायेगें -
यह सोच आज ठहरे कब थे.
      ——————
- नीरज गुरु ” बादल’
                    भोपाल

 

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“खुशी के होंगे या ग़म के होंगे -
यह सोच आंसुओं को बहने से रोका कब था”
dil ko chu jaane waali panktiya.

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