अब ये देश जला दो
राम मरे रावण के हाथों, सीता मैय्या जल गई
गुरुग्रंथ बस ग्रंथ बन गया, उमर बुद्ध की ढल गई
कुछ भी नहीं है शेष, अब ये देश जला दो.
मुसलमान ने हिन्दु मारा, खुदा हुए परेशान
हिन्दु ने हथियार उठाया, अब रोया भगवान
मंदिर मस्जिद सब घबराये, खतरे में है जान
हँसता है हैवान, ना मिलता एक भी अब इंसान
धर्म का ये संदेश कि अब ये देश जला दो.
मधुशाला की साकी को, खुद मदिरालय ने मारा
हिमगिरि का उत्तुंग शिखर भी, मूक रहा बेचारा
हारे को हरिनाम मिले क्या? हरि स्वयं भी हारा
कवि भरा है कोलाहल से, सूखी कविता धारा
दंग है हर दर्वेश तो अब ये देश जला दो.
खून रोज ही देते हैं, आजादी ना मिल पाई
और सुरसा के मुख के जैसे, बढ़ती है मंहगाई
संसद में बरसात, बदली है सारे देश में छाई
लोग कहीं और तंत्र कहीं हैं, लोकतंत्र है भाई
लो माचिस है पेश, अब ये देश जला दो.
47 Comments
Someone once said that anyone can write love poems, but it takes creativity and talent beyond a certain level to pull off something bigger, like this!
How about sharing the audio of this poem?
Brilliant and keep writing!
well……………. aapne bohot hi achche se yeh likha. the fire inside you has ignited my heart. but please yeh desh mat jalao.
bhai jaan aapne apna loha manwa hi diya aakhir kaar… iam flattered with ur poem… and will say that may god bless and blossom poet like u……
badhti hai mehngai, jaise sir ke kesh
ghata nadi ka jal, badhta hai kalesh
davanal ki aag mein jalta hai yeh desh
Intention is very good but presentation is negative. Pl try to avoid this. You are dooing well go ahead.
प्रेमचंद गुप्ता साहब!
सबसे पहले मेरी कविता पर टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद! क्षमा याचना के साथ कहना चाहूँगा कि आपने मेरी कविता को नहीं समझा. वस्तुतः यह एक व्यंग्य रचना है और इसका ध्येय नकारात्मक ना हो कर सकारात्मक एवं आशावादी है.
This is realy a great poem. This shows a emotional depth of a poet who really worried over the present situation of the country.
I heard you recite the poem at the meet, but reading it again to get to its depth. Indeed, this is a good sarcastic poem and has a positive message for everyone. Keep it up, Vikash, you have done a good job!
Vikaas, I have not read any of your other poems, but if this is the benchmark you have set for yourself, you have an extremely bright future.
Good satire, well thought off, good flow. Other poets should take a cue from you. This is poetry.
Keep it up.
॒@शंकर जी
देश जलाने का मेरा कोई इरादा नहीं है. आप सचमुच मत जला दिजीएगा. ये व्यंगय रूप में लिखी गयी है एवं इसका उद्देश्य बड़ा पवित्र है.
ओम जी, रेणु जी! बहुत बहुत धन्यवाद. इसी तरह उत्साह वर्धन करते रहें.
डाक्टर साहब! आपसे मिलना सौभाग्यपूर्ण रहा. इसी तरह कृपादृष्टि बनाये रखें.
कलावती जी एवं रवीन्द्र जी! सादर नमन! आशीर्वाद बनाये रखें.
Really Good One. it’s shows our activity whatever the things is going on in our country. you have tried to point out the real things , now this is our turn to kick out all those who are involved to doing all these things. well aritten.
वह देखो! कुछ बिरला रतन सा दिखता है
वह देखो! तम घटता-सा भी दिखता है
वह देखो! पग पग गिरता, फिर फिर उठता
भारत-मानव धीरे-धीरे दुनिया चढ़ता-सा दिखता है
वापस लेता निर्देश कि “अब ये देश जला दो”
साथ चलो औ’ साथ बढ़ो, ये विश्व हिला दो
बहुत खुब विकाशजी,
आज देश को इस तरह कि कवियों कि जरुरत है जो उन्हें जगा सके इसे आपको पेपर में भी देना चाहिये…….
Wow got the oopurtunity to read this one thru the ‘highest rated’ poems links .. and i am glad that i did read it .. very wonderful .. enjoyed it thoroughly ..many kudos to you Vikash Ji
apke shabdo me virodabas hai aap likhte hae “kuch bhi nahi hai shah” aur bad me jalane ki baat kar rahe hae jab ki jalane vali pankti pahle ani chaiye aur shesh bad me subject bahut
acha hai ,apki kalpna me nikhar aiga aisa mujhe lagta hai
shubh ashish sada khush rahe
co-09827098925
note-barsat par koi rachna ya gazal likhe
भगवानदास जी!
टिप्पणी के लिये बहुत बहुत धन्यवाद. आपने जिस विरोधाभास का जिक्र किया है, उसके बारे में दो शब्द कहना चाहूँगा.
जब भी बहुत ज्यादा कचरा इकट्ठा हो जाता है तो उसमें से कुछेक काम की चीजें चुन के बाकी को जला दी जाने की परंपरा रही है. (कम से कम गाँवों में).
तो मैं कहना चाह रहा था कि अब कुछ तत्व शेष नहीं है, सो जलाने में संकोच आवश्यक नहीं. बेखटके हम बिना अफसोस के यह कार्य संपन्न कर सकते हैं.
गुरुग्रंथ बस ग्रंथ बन गया,
I do have ojection on this line…
You can even find The GOD… pahle Druva aur Prahlad ban ke to dekho…
कण कण में बसता भगवान
जन जन में रहता भगवान
माया तेरी बड़ी निराली
एटम में रहता भगवान ।
इलेक्ट्रान है छोटा कितना
सुई नोक का खरब है जितना
एटम में जब छ्लांग लगाए
ऊर्जा का इक अंश निकलता ।
कवि कुलवंत सिंह
Vikash Reply:
October 31st, 2008 at 1:20 am
सर! लगता है कि आपने कविता पढ़ी नहीं या फिर मुझे टिपण्णी का सन्दर्भ समझ नहीं आया.
its very good that we have poets like you and your poem is very good , you should write something more. kee up it , keep writing more about the country
यहां वहां जहां तहां देखी कितनी चिंगारियां
आदमी सड रहा, झड रहा फफूंद है
आधी सदी सुन गयी,जीजीविषा घुन गयी
मिट्टी हुआ,दुबका पडा, खोल में बारूद है…
tooooooooooooooooo gooooooooooooooooooooooooooddddddd such insaan paagal ho chuka hai use kuch bhi nahi dikh raha
ur poem is on current topic and i appriciate ur poetry and i hope that u will make such type of poetry in the future also….
प्रीय विकाश, आपका भाव स्पश्ट है…परन्तु क्श्मा मान्गते हुए कहना चहूगा कि एक काव्य रचना के रूप मे अभी आपके काव्य मे कफी सुधार की अवश्यक्ता है…आपकी यह रचना व्यँग्य नही है क्यौकि व्यँग्य मे कवि या लेखक एक बहुत गम्भीर विचार को हास्य रूप दे के प्रस्तुत करता है…आपने खूब हिन्दी कविताओ का अध्ययन किया है यह आपकी कविता के तीसरे छंद मे बच्चन निराला अदि की कविताओ के संदर्भ से स्पश्ट है…in the end i’ll just conclude by saying that being too direct and agressive is bad for a poem…please take no offence as no offence is intended…n please carry on writing and strive for improvement with each attempt…
Vikash Reply:
October 31st, 2008 at 1:18 am
स्कन्द जी! लगता है कि आपके व्यंग्य की परिभाषा सामान्य जन की परिभाषा से तनिक अलग है. या संभवतः आपने हास्य और व्यंग्य को एक ही विधा के रूप में समझ लिया है. आपने कहा है: “…क्यौकि व्यँग्य मे कवि या लेखक एक बहुत गम्भीर विचार को हास्य रूप दे के प्रस्तुत करता है”.
मैं जानता हूँ कि आप साहित्य के छात्र हैं इसलिए महत्व देते हुए मैंने आपकी टिपण्णी के साथ साथ फिर से अपनी कविता एवं सारी टिप्पणियां पढीं. आप पहले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने यह कहा है कि यह व्यंग्य नहीं. मुझे लगता है कि आपने हिन्दी साहित्य का उतना गहन अध्ययन नहीं किया जितना की अंग्रेजी का. खासकर व्यंग्य. व्यंग्य केवल हास्य रस से भरा हो, यह आवश्यक नहीं. व्यंग्य तीखे एवं पैने भी होते हैं.
लेकिन आपकी यह बात सत्य है कि मुझमे सुधार की आवश्यकता है.
मेरी कोशिश जारी है. आशा है आपके अमूल्य सुझाव मिलते रहेंगे.
Vikash Reply:
October 31st, 2008 at 1:25 am
और हाँ! मैंने बच्चन की कविता का सन्दर्भ तो दिया है लेकिन निराला का नहीं.
‘हिमगिरि का उत्तुंग शिखर’ – प्रसाद की ‘कामायनी’ की शुरुआत है और ‘हारे को हरिनाम’ दिनकर की रचना है.
Bahut hi achche se abhivyakt kiya hai dil ki aag ko aapne…Lekin aag ka bhi agar sahi istemal kiya jaye to ye sansar ko aur bhi achcha bana sakti hai…I mean one should use it in positive way…
Kavita ke liye bahut-bahut badhai!!
कविता पढ़ी बहुत आनंद आया ,मेरे ख्याल अप से बिलकुल मिलते हैं ,लोगों ने टिप्नियाँ लिखी है ,शायद उन्हें मूल ही नहीं समाज आया ,आप को नाम मिले यही मेरी इत्छा है — दिग्विजय
बेटा, बहुत अच्छी है आपकी कविता, आपका भी दिल जलता है देश की स्थिती देखके, मै भी बहुत रोता हु, प्रभु यीशुसे गिड्गीडाता हु की मेरे भाईओ को कुछ समज दे, क्योंकी इस देश का कोई भी माई बाप नहि है, क्योंकि मेरे देश के लोग सच्चे पिताको नहि मानते और जुठे पंडितो की जुठी मुर्तीपुजा में फंसे पडे है, कहेते तो है के परमात्मा दिखता नहि है तो फिर मुर्ती किसकी है? क्या वह परमात्मा है? क्या वह देवी परमात्मा है? मरने के बाद हम उस्के पास तो नहि जायेगे या हमारा शरीर जिस वजह से जींदा है वह आत्मा तो उन्होने नहि दी है, तो वह हमारे माई-बाप कैसे बने? सच्चा माई-बाप तो परम पिता परमेश्वर है जिसके पास हमे जाना है और हम उस्की पुजा नहि बल्की अन्योकी पुजा करते है इसलिये हमारा पिता हमसे रुठा हुआ है, और उसी वजह से हम सबके सब दुःखी है और सब चोरो के हाथ गुलाम बने हुए है, इसलिये बेटा, सबको परमात्मसे मिलाने का काम करो, विवेक्चुडामणी, योग्सुत्र, ब्रह्मसुत्र, गीता पढने और पिता को समजने की सलाह दो और रामायण-महाभारत को फेंक देना सीखाओ क्योंकी वहि है जो हमारे देश को बीगाड रहे है और परम पिता से दुर रख रहे है, और फिर भी न हो सके फिर आखीरमें बाईबल पढना सीखाओ, जो यीशु प्रभु के द्वारा परमात्मा के पास जा सके, क्युकि यीशुजी ने आपके, म्रेरे और सबके लिये अपना बलिदान दिया हुआ है, और हमे प्रार्थन के अलावा और कुछ करनेकी जरुरत बहि है जो मैने ४५ साल तक किया था और कुछ भी न पाया था बल्कि मेरे पौनी जींदगी बर्बाद हो गई और धन भी बेकार गया, पंडित सारे जुठे है, उन्हे कुछभी ज्ञान नहि है, तामाकु खाते है, दक्षिणा पाते है और सारा समान ले कर चले जाते है, और उन्से पुछो की हमे कुछ बताओ तो कुछ बता नहि पाएगे, ज्योतिषभी जुठा है, सिर्फ और सिर्फ परमात्मा हि आप्के-मेरे और सबकी जानता है तो उसी से पुछो वह आपका पिता और रखवाला है, उसे मानो तो वह खुष होगा और तुम्हे आशिष देगा और तुम आकाश के पंछी तराह आजाद हो जाओगी……………….जय भारत

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मैं एक स्वप्नद्रष्टा हूँ. हर वक्त सपने देखने का साहस करता हूँ और उन्हें सच मानने की मूर्खता. मुझमें असंभव की आकांक्षा है और मैं जीवन के अध्ययन में प्रयत्नरत हूँ.
awesome,great work.its one of the best satires i have ever read in hindi.it is so true.sarcsm beautifies the poem and the truth stands by itself.well written.
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