दोहे

दोहा - भगवन (कलयुग में -)

भगवन सुख से सो रहा, असुर धरा सब भेज
देवों की रक्षा हुई, फंसा मनुज निस्तेज

दोहा - मैं मैं मरता

मैं  

मैं मरता मर मिटा, मिट्टी मटियामेट
मिट्टी में मिट्टी मिली, मद माया मलमेट

 

  

 सच  

की अर्थी ढ़ो रहा, ले कांधे पर भार
पहुंचाने शमशान भी, मिला कोई यार

 

दोहा - सच

 

 

  

 कलयुग  

में मैं ढो़ रहा, लेकर अपनी लाश
सत्य रखूँ यां खुद रहूँ, खुद का किया विनाश ||

 

दोहा - कलयुग

 

 

 दोहा  - रावण  

रावण  

रावण जो दिखे, राम करे संहार
रावण घूमे राम बन, कलयुग बंटाधार

 

 

कवि कुलवंत सिंह

 

Comments

Nice to read dohe…reminds me of school time when we had to memorize kabir dohas :)

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